Sunday, 17 March 2013

सुनो कनु ---------


सुनो कनु ------
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देखो न ये मैने क्या किया
-------तुम्हे किसी सौतन नज़र न लगे
अपनी आँख की कोर से
-------तनिक सा काजल ले
मैने लगाया था डिठौना
-----------मुझे क्या पता तुम तो
और श्याम वर्ण हो जाओगे
-------देखो अब रूठ न जाना मुझसे
तुम जानते हो नहीं रह पाती मै ------
-------तुम्हारे बिन कहाँ चले जाते हो तुम
जब भी तुम्हारे ख्याल में खोई रही तो लगा -------
---- जैसे अपनी ठोड़ी मेरे सर पर टिकाये हुये ---
कोई बैठा है वो तुम ही हो न कनु ---------
------पलट कर देखती हूँ तुम्हे तो ...
सुनो कैसे देखते हो तुम कि मै सब भूल जाती हूँ
-----पता है तुम्हे कितनी बोलती हैं तुम्हारी आँखे
एक बात बताऊँ जो तुम नहीं जानते ?
मेरे हर्दय के भीतर सात द्वार है -------------
-----पहले द्वार के पार कोई कभी जा ही नहीं पाया ------
और तुम न ---न जाने कितनी चाबियाँ है तुम्हारे पास
------सातों द्वार खोल कब भीतर जा बैठे -----उस जगह -----
जहाँ आज तक कोई न पहुंच पाया --------
-------पता है कनु तुम तो जानते हो मुझे
मै भटक जाती हूँ इस दुनिया में -----------
------मुझे छोड़ के क्यूँ चले जाते हो ---------
मुझे पता है तुम आस पास ही रहते हो ---
-------पर दीखते तो नहीं हो न क्यूँ सताते हो
अब बस भी करो न देखो न ---------
------- मेरी -आंखे भीगती रहती है ---कभी तो सारी सारी रात
और उसी नम् सिरहाने पर -------------------
-------------जाने कब आँख लग जाती है -------------
और तब मेरे पास होते हो --- तुम कनु सिर्फ तुम ही
------अब आ जाओ न कनु -----
------------------------दिव्या -----------------------------------
17-3-2013 --
पेंटिग --विशाखा त्रिपाठी
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