Tuesday, 19 March 2013

क्या मै कुफ्र बोलती हूँ -------


क्या मै कुफ्र बोलती हूँ
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चुप सुनसान रातों मे
ख्यालों के रेशमी धागों से
रोज़ रोज़ ---------
ओढ़नी सीती हूँ ----
काले पड़े सितारों को
उधेड़ती हूँ बार बार
जानते हो पुरानी सीवन
खोलने मे हाथ ही नहीं
आत्मा भी जख्मी हो जाती है
रिसता रहता है खून --------
रात मद्धम सुरों में गुनगुनाती है
आधे चाँद के टूटे प्याले में
गरम चांदनी उड़ेल
आँख मूंद के ---
मै घूंट घूंट पीती हूँ
और वो -----
पुराने गोटे जो बरसों से
चुभ रहे थे आत्मा मे
उन्हें मैने उन्हें निकाल कर
सालों पहले ही दफना दिया था
साथ ही वो सब कुछ भी
जो किस्मत कह कर
पोटली में मुझे थमाया था
मेरे अपनों ने ------------
वो मेरी नहीं थी क़र्ज़ थी
किसी जनम का मुझ पर ------
अदा कर दिये क़र्ज़ -और फर्ज
अब सिर्फ इबादत के धागों से
अपना कफ़न बुनती हूँ -----
अब तुम ही बताओ
अपने दिल से पूछ कर
क्या मै कुफ्र बोलती हूँ ---
----------Divya Shukla--------
19-3-2013
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