Tuesday, 19 March 2013

क्या मै कुफ्र बोलती हूँ -------


क्या मै कुफ्र बोलती हूँ
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चुप सुनसान रातों मे
ख्यालों के रेशमी धागों से
रोज़ रोज़ ---------
ओढ़नी सीती हूँ ----
काले पड़े सितारों को
उधेड़ती हूँ बार बार
जानते हो पुरानी सीवन
खोलने मे हाथ ही नहीं
आत्मा भी जख्मी हो जाती है
रिसता रहता है खून --------
रात मद्धम सुरों में गुनगुनाती है
आधे चाँद के टूटे प्याले में
गरम चांदनी उड़ेल
आँख मूंद के ---
मै घूंट घूंट पीती हूँ
और वो -----
पुराने गोटे जो बरसों से
चुभ रहे थे आत्मा मे
उन्हें मैने उन्हें निकाल कर
सालों पहले ही दफना दिया था
साथ ही वो सब कुछ भी
जो किस्मत कह कर
पोटली में मुझे थमाया था
मेरे अपनों ने ------------
वो मेरी नहीं थी क़र्ज़ थी
किसी जनम का मुझ पर ------
अदा कर दिये क़र्ज़ -और फर्ज
अब सिर्फ इबादत के धागों से
अपना कफ़न बुनती हूँ -----
अब तुम ही बताओ
अपने दिल से पूछ कर
क्या मै कुफ्र बोलती हूँ ---
----------Divya Shukla--------
19-3-2013
पेंटिंग गूगल से


18 comments:

  1. प्रेम की गहन अनुभूति
    वाह बहुत सुंदर रचना
    बधाई

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया ज्योति खरे जी --आभार

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    1. शुक्रिया आपका कालिपद जी --

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  3. बहुत खूब !

    आज की ब्लॉग बुलेटिन होली तेरे रंग अनेक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. रचना को ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार धन्यवाद शिवम मिश्रा जी --

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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    1. चर्चा मंच में सुंदर सुंदर लिंक्स में इस रचना को स्थान देने के लिए आपका हर्दय से आभार प्रदीप साहनी जी --

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    1. शुक्रिया --sweet shaily Angel

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  6. पुरुष प्रधान समाज में जब स्त्री होना ही अपराध होता जा रहा है तो एक स्त्री का अपने मन-मुताबिक़ जीना किसी कुफ्र से कम है क्या ?....मार्मिक

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    1. सच कहा शिखा गुप्ता जी --आभार

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  7. प्रेम की गहन अनुभूति,बहुत ही सुन्दर रचना.

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    1. राजेन्द्र कुमार जी हार्दिक धन्यवाद --

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  8. अदा कर दिये क़र्ज़ -और फर्ज
    अब सिर्फ इबादत के धागों से
    अपना कफ़न बुनती हूँ -----

    ....बहुत भावपूर्ण उत्कृष्ट प्रस्तुति...

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार ब्लॉग पर स्वागत है आपका कैलाश शर्मा जी --

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