Thursday, 7 March 2013

रेत और बालू पर सेतु नहीं बनते -------


रेत और बालू पर सेतु नहीं बनते
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वो सपनो में जीती थी -----
-----वहां आने की इजाजत
किसी को नहीं थी --------
एकांत छ्णों की वो मुग्धा
जिन चाँद सितारों से अपने
सुख दुःख सांझा करती थी
अचानक उनसे मुंह फेर बैठी
दूर तक फैला सन्नाटा -------
---------नीरव निस्तब्ध रात
ये रात घंटो पलों की नहीं -------
-----------युगों जैसी लग रही है
आत्मपरीक्षण के छण ------------
----------कठोर होते है निर्मम भी
स्वयं के सत्य को परखना----------
-----कठिन होता है वो भी निर्ममता से
और बिना किसी पक्षपात के  -----
-------इसी सोच विचार में मग्न थी
न जाने कब आकाश से उतर के------
------चाँद धीमे से उसके पास आ बैठा
और बोला तुम मुझ से क्यूँ नाराज़ हो
वो शब्द जाल थे एक चक्रव्यूह था ----
-----जिसमें उलझ गई थी तू मेरी दोस्त
थोडा वक्त ले और वापस आ जा -------
-फिर से चाँद सितारों की निष्पाप दुनिया में
ये सारी कायनात कितनी सुंदर है -----------
-------ह्म्म्म आती हूँ बस खुद से नाराज हूँ
और तुम सब से शर्मिंदा ---क्यूँ दूर हुई तुमसे
चाँद जोर से हंसा सच कभी शर्मिंदा नहीं होता
चलो हम सब मिल कर वो सारे पुल तोड़ दें
जहाँ से झूठ छल चल कर फिर कभी न आ पायें
मैने चाँद का हाथ थाम लिया और कहा --------
----------मेरे दोस्त नदी में जब उफनती है तो
सारे कगार बह जाते है --पूरी तरह ----------
------------रह जाती बस रेत और बालू
कोई सेतु नहीं बन पाता उन पर ----------
--------चाँद मुस्करा दिया -और वह ??
वो तो सो गई निशचिंत हो के ------------
----------------दिव्या शुक्ला ---------------
7-3-2013
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