Thursday, 14 March 2013

सुनो पहचानते हो मालिक ? --स्त्री हूँ मै


सुनो पहचानते हो मालिक ? --स्त्री हूँ मै
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न अपना नाम न गाँव अपना
जो तुमने दिया वो ही अपना लिया
सुनो पहचानते हो मालिक --स्त्री हूँ
तुम्हारी कविता से लेकर समाज की हर
ज्वलंत समस्या का एक हाट टापिक हूँ
अरे नहीं जानते स्त्री हूँ ----सोचो न
अगर तुम ही बदल जाओगे तो फिर ?
न खाप होंगी न संसद में बिल का लफड़ा
न धरना न प्रदर्शन --कितनी बोरिंग सी होगी लाइफ
कितने तो बेरोजगार होंगे --कोई पोस्टर लगाता है
तो कोई बैनर ---कोई कोई तो जब
हममे से कोई मार दी जाती है
उसको ठिकाने लगाने का बन्दोबस्त भी
अरे मालिक जान है हममें भी दर्द भी होता है
कभी सोचा है जब हमारे जन्म की खबर सुन
दादा दादी का चेहरा उतर जाता है
गोद में भी नहीं उठाया और बोल पड़ी
मुंह बना के आय गई हमरे भईया के
छाती पर मन भर का बोझ -------
टुकुर टुकुर देख रही थी मै तब भी
बस बोल नहीं सकती थी न --
पर मेरे नन्हे वजूद ने पढ़ लिए थे
आँखों के भाव ----और फिर देखा
माँ का चेहरा उतर गया छाती से मींच लिया मुझे
धीरे धीरे जगह बना ही ली न मैने
अपनी बालसुलभ मासूम हरकतों से
पर रही दोयम दर्जे की आज भी तो देखो
सब कुछ तो निर्भर हम पर और फिर भी
गाँव के प्रधान की तरह फैसला तुम्हारा
बंद करो तुम ये सब हमें पता है अपनी मर्यादा
बस तुम छलना बंद करो ---- मालिक
स्त्री बिल बना रहे हो ---कब बनाओगे
अरे बना भी दोगे तो कोई पेंच फसा दोगे
और हम वही की वहीँ रहेगी -----अभी देखो
हममे से कोई उच्चपद पर होती है तो
कितनी आलोचना कितने कार्टून --
हास्यास्पद लेख सिर्फ इसलिए न कि
स्त्री है न वो और मालिकों कहाँ बर्दाश्त ये सब
उनके आधीन काम करें - अब थोडा बदलो
अब बस करो दर्द होता है हमें भी मालिक
------------------दिव्या -----------------------------
14-3-2013
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