Saturday, 9 March 2013

सक्षम है असहाय नहीं फिर ये महिलादिवस ये नारे क्यूँ ?



 सक्षम हैं  असहाय नहीं
----------------------------------
हाँ मै औरत हूँ मेरा औरत होना
मुझे कमजोर नहीं करता ---
ये महिलादिवस ये नारे ये बधाईया
मुझे हंसी आती है क्यूँ क्यों करते हो ये सब
कहाँ कमजोर हूँ मै --मुझे हर वर्ग में देखो
मुझ पर ही तो निर्भर है ये रिश्ते
बेटी के रूप में पिता का मान रखना
बहन का भाई से झगड़ना दुलारना
पत्नी का पति का ख्याल रखना
प्रिय के मान का मान रखना
मुझे कमजोर नहीं बल्कि मेरी
महत्ता को बढाता है ------
मै कमजोर नहीं धैर्य है मुझमें
धरा सा धैर्य ---जो हमेशा नहीं डोलता
जब डोलता है तो अनर्थ होता है
किसी भी वर्ग की नारी हो अति होने पर
आँखों में अंगार भर लेती है तो
भस्म हो जाते है उसमें बड़े बड़े भस्मासुर
रोज़ हर रोज़ ये नारीवाद के नारे क्यूँ
नारी धरा है प्रकृति है तो पुरुष आकाश
दोनों मिल कर सृष्टि को चला रहें है
अपनी अपनी भूमिका निभा रहे हैं
अंपनी अपनी शारीरक छमता अनुसार
दोनों अपना अपना कर्तव्य का वहन करते हैं
इसमें छोटा बड़ा स्त्री पुरुष का भेदभाव कहाँ
गृहस्थी की भूमिका निभना कौन सा सरल कार्य है
अपने बच्चो और बुजुर्गों की देखभाल परिवार का ख्याल
रखना ये नारी का शोषण कहाँ हुआ --------
जिस धैर्य से माँ बच्चे की बात सुनती है
पिता में वो धैर्य नहीं होता --------
-बस इसीलिए उनकी भूमिका तय है
संतुलित समाज के लिए यह ही जरुरी
सब अपनी भूमिका निभाए अगर जरूरत हो तो
एक दुसरे के काम में सहयोग दें ------
सीमारेखाए दोनों के लिए है --कोई भी पार करे ये गलत है
बिना बात का ढोल पीटना भी गलत है -----------
अपनी जिम्मेदारी अपनी भूमिका निभाना कमजोरी नहीं
आज किसी भी नारी को नारे की जरूरत नहीं
भला शक्तिस्वरूपा को सहारे की जरूरत क्यूँ
वो तो जन्म देने से लेकर --चिता तक जाने तक
हर स्वरूप में पुरुषों को सहारा प्यार संभाल देती आई है
----------------------दिव्या शुक्ला ----------------------------
----9--3--2013------
हर साल महिलादिवस क्यूँ मनाते हो
मुझे कमजोर लाचार सिद्ध करने के लिए
अब एक प्रश्न सभी माता पिता से ईमानदारी से जवाब दें
किसे मूंछ वाली लड़की और साडी वाला लड़का अच्छा लगेगा ?
-----------------------------------------------------------------------
ये पोस्ट मेरी सोच मेरा व्यक्तिगत विचार है किसी विवाद का विषय नहीं
-------------------दिव्या शुक्ला --------
 — 

6 comments:

  1. सक्षम हों अपने स्तर पर, न किसी की नक़ल कर।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद प्रवीण पाण्डेय जी --आभार

      Delete
  2. Prashan Ho To Aisa Ho Ki Jawab Me Zubaan Na Khule... Bahut Khoob

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया अभिषेक कुमार जी -आभार

      Delete
  3. Divya ji, aapki kavita ek aham sawal uthati hai, Mahilayon ko abhi unke poore haq nahi mile, hamari azaadi par, aarthik swatantrata par, har kadam bandish lagayi jaati hai, is liye mahila diwas zaroori hai adhikaaron ki ladai ke liye, mahilayein kumzor nahi bilkul bhi, lekin ek ladai ka saamna kar rahi hain, gender discrimination ki ladai,

    ReplyDelete
    Replies
    1. सच कहा पंखुरी जी --

      Delete