Monday, 1 April 2013

शब्दों के पुल और एक खामोश नदी


शब्दों के पुल और एक  खामोश नदी

-------------------------------------

ख्यालों की रात ---

समेटे हुये अपने अंदर

खामोश बहती जा रही

यादों की नदी -----

निरंतर न जाने कब से

घंटो तट पे बैठ ----

अपलक निहारती मै --

फिर न जाने कब

कल्पनाओं मे शब्दों के

पुल बना नदी के पार

उतर जाती ------

आज फिर आ बैठी

वहीँ यादों की भवंर मे

डूबने उतराने को --

रात गहराती जा रही

चाँद भी है --पर

न जाने चाँद रूठा है

या चाँद से रात रूठ गई

गहरी काली रात

मेरे ख्यालों की -----

और फिर आसमां ने

मन पढ़ लिया ------

बादलों से नमी ले कर

बूंदे टपका दी -----

और मेरी सूखी

आँखे नम् हो गई

हवा के झोंके से

यूँ लगा जैसे

मुझे छू कर कोई

पास से गुज़रा

और धीमे से कानों में कहा -----

मै यही तो हूँ तुम्हारे आस पास

आँखे मूंद कर देखो तो सही

चलो भरम ही सही ---

पर इक पल को लगा

तुम आ गये -------

-----Divya Shukla-----

30-5-2012

पेंटिग गूगल से