Saturday, 20 April 2013

ये तितलियाँ -क्यूँ बदल जाती हैं ?


ये तितलियाँ -क्यूँ बदल जाती हैं ?

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कभी सोचा है किसी ने

छोटी मासूम तितलियाँ

ततैया जैसी क्यूँ बन जाती है

नहीं न --तो सोचो

कहाँ कहाँ से गुजरती हैं

अपनी मिठास खो कर

जब नीम सी कड़वी

जुबान हो जाती है

वो उगलती है

वैसी ही गालियाँ

जो माँ देती है गली में

खड़े शोहदों को --तो कभी

बड़े घरों के साहबों को

झुग्गी बस्तियों में उम्र से पहले ही

समझदार हो जाती हैं ये बच्चियां

वो क्या बताएं जब सुबह

वो बाहर नहाती हैं एकलौते

म्युनिसपलटी के नल पर

तो सामने बालकनी से

दादा पोते दोनों घूरते हैं

पकडे जाने पर बडबडाते भी


कितनी बेशर्मी फैला रखी है

सरकार कुछ करती भी नहीं

वी आई पी कालोनी का कबाड़ा

बना के रख दिया इन झुग्गीवालों ने

तब कड़वी हो जाती है

इनकी की जुबान -----

साले -नासपीटे काहे नहीं

बनवा देते गुसलखाना --

और तो और आज जब

वो कोठी वाला साब बड़े

प्यार से कहने लगा

कोई जरूरत हो तो मुझे

कहना ----पर उसकी

नज़रें भटक रही थी

कहीं कहीं फटी हुई

ड्रेस के आर पार

तब भी कड़वी हुई थी जुबान

हरामी कमीना पहचानता भी

नहीं ये ड्रेस उसकी बेटी की ही तो है

कैसे पहचानता वो उसे ---

बेटी की उम्र की ये नन्ही लड़की

औरत का जिस्म ही तो लगी थी

ये कड़वी जुबान कभी कभी

बचा ले जाती है इन्हें

यही तो एक मात्र हथियार है

इनका --पर इनका मन तितलियों जैसा है

जो देखना हो तो देखो कभी

जब इकट्ठी होती है ये

इतवार वाली फुटपाथ बाज़ार में

नन्ही नन्ही चहकती चिडयों जैसी

छोटी छोटी खुशियाँ खरीदती हुई

-----------Divya Shukla----------

पेंटिग अज्ञात कलाकार

19-4--2013

12 comments:

  1. बहुत सुंदर दिव्या जी ....

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    1. आभार अदिति पूनम जी --

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  2. आज की ब्लॉग बुलेटिन क्यों न जाए 'ज़ौक़' अब दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. ब्लॉग बुलेटिन में हमारी पोस्ट शामिल करने के लिए आभार धन्यवाद --

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  3. बहुत सुन्दर

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    1. शुक्रिया ममता बाजपेई जी --

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    1. बहुत बहुत आभार आशा विष्ट जी

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    1. हार्दिक धन्यवाद निवेदिता श्रीवास्तव जी --

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  6. कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति .

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    1. धन्यवाद आभार सुषमा जी

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