Monday, 22 April 2013

झरती रही सूखी गर्म राख -----



झरती रही सूखी गर्म  राख
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शफ्फाक सफ़ेद चादर पे ----
---------टंकी दो काली आँखे
उफ़ खाली आँखे में----------
------- दर्द की ये कैसी सिहरन
रूह की गहराईयों से---------
----------ज़ज्बात की खुनक
कौन आया ?फिर गया ही क्यूँ
अंदर बाहर सब धुआं धुँआ
सुलगती रही रूह सब राख हुआ
आँखों से झरती रही सूखी गर्म राख
उसी राख में एक अस्तित्व दफ़न हुआ
काली जिल्द वाली खाली किताब लिए
मौत खड़ी रही हस्ताक्षर के लिए
और उसने उसे निराश नहीं किया
------------Divya Shukla----------------
22--4--2013
पेंटिग गूगल से



4 comments:


  1. सुंदर
    वर्तमान का सच गहन अभिव्यक्ति
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

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  2. बढ़िया प्रस्तुति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को, अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post बे-शरम दरिंदें !
    latest post सजा कैसा हो ?

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  3. जैसे जैसे मन सूखेगा,
    झड़ती जायेगी यह पपड़ी..

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