Saturday, 6 April 2013

ये रेशमी अहसास तुम्हारे ----


ये रेशमी अहसास तुम्हारे

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मेरा उलाहना

तुम्हारा मुस्कराना

चलो हटो जाओ

उफ़ हद हो गई

तुम तो टूर पर हो

और मै तुम्हारे

ख्यालों के टूर पर

सोचते ही -----

मीठी सी मुस्कान

तैर गई होठों पर

धीमे से आँख मूंद ली

पास आ गई तुम्हारे

चलो चलें --कहाँ ?

सोने ----देर हो गई न

रात बहुत हो गई

कौन बोला ये ? --तुम न

ये रेशमी अहसास ----

ये आवाज़ तुम्हारी

ही हो सकती है

इन दीवारों में

बिस्तर मे किताबों

छोड़ जाते हो न

मेरी देखभाल को

जब तुम यहाँ नहीं होते हो

पर फ़िक्र तो तुम्हें

रहती ही है ---

है न ?---सच कहा न ?

अब इतना तो

तुम्हें जानती ही हूँ मै

-------Divya Shukla----------

6-4-2013

पेंटिग --अज्ञात कलाकार

10 comments:

  1. सुन्दर रेशमी अहसास...
    सुन्दर प्रेमपूर्ण रचना...

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  2. बेहतरीन प्रेमरस की कविता,आभार.

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  3. चलो चले वहां ....जहाँ मंजिल चले .....

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  4. बहु खूब . सुन्दर . भाब पूर्ण कबिता . बधाई .

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  5. सुन्दर....
    बहुत सुन्दर एहसास...

    सादर
    अनु

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
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