Saturday, 4 May 2013

तुम्हारा दिया अगर तुम्हे लौटा दूँ तो ?



तुम्हारा दिया अगर तुम्हे लौटा दूँ तो ? 
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देर तक सोने वाली मै न जाने क्यूँ

आज सूरज की पहली किरण के साथ ही

उठ गई सच कहूँ तो सोई ही नहीं --

अमूमन ठंडी चाय पीने वाली मै

बहुत गर्म सिप ले रही थी

कोशिश थी इसी से जला दूँ

सारी कड़वाहट सारा आक्रोश जो

धीरे धीरे जम गया है मन में --

जरा जरा सी बात पर ---

तुम्हारा आहत होता अहम

मुझे रुला के ही संतुष्ट होता

पर तुम नहीं जानते थे शायेद

ह्रदय में भरा निश्चल निस्वार्थ

प्रेम घटता ही गया और फिर

एक दिन पाषण में बदल गया

पर तुम्हे क्या तुम तो पुरुष हो

तुम्हारे लिए प्रेम का अर्थ कुछ और है

ये इमोशन ये आंसू सब बकवास हैं

हमारा स्वाभिमान जिसे लेकर

तुम्हारे पास आते हैं वो तो सबसे बड़ा

खतरा है तुम्हारे अहंकार पर ---

उसे चूर चूर करने में सारा जीवन

सारी शक्ति सारे दांव पेंच लगा डालते हो

पर क्या कर पाते हो नहीं न ----

जितनी बार जितने रूपों में

तुम्हारा अहम मेरे सामने

विषैले नाग की भाँती फन फैलाये

फुफकारता आ खड़ा होता है

तुम्हारे जहर को दरकिनार कर

अपने वजूद के बिखरे टुकड़ों को

समेटती हूँ --अपनी रीढ़ की हड्डी को

और भी मजबूत सीधा कर सारी ताकत

बटोर हर बार तुम्हारी आँखों में झाँकती हूँ

नहीं चाहिए दो बूंद गंगाजल तुम्हारे हाथ से

अपनी अंतिम सांसो के लिए ------

उस गांधारी का प्रतीक हूँ

जिसने पिता के निर्णय के प्रतिकार स्वरूप

आँखों में पट्टी बाँध ली थी ----

जिसका एक वाक्य श्री कृष्ण के

पैरों में बहेलिये का तीर बन चुभा था

बस अन्तस् से निकले इसी वाक्य से

बचना तुम ------------

--तुम्हारा दिया अगर ------

सारा का सारा तुम्हे लौटा दूँ

तो तुम सभाल पाओगे क्या ?

ये ही सोच कर देर तक हंसती रही

कमजोर हो तुम ---चलो जाओ

----------Divya Shukla-----------

4--5--2013

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अज्ञात कलाकार