Friday, 10 May 2013

गीली आँखों के सूखते सपने --


गीली आँखों के सूखते सपने

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मासूम आँखों में

तिर रहे हैं कुछ प्रश्न

आक्रोश भरे --

क्या हमें पानी भी

नहीं मिल सकता ?

जितना पानी व्यर्थ

बहाते हो तुम सब

हम और हमारे ढोर

उतने में ही अपनी

प्यास बुझाते हैं

पता भी है तुम्हे

नालियों से गड्ढों से

पानी पीना कैसा होता है

पर जीना है तो पीना है

ऐसे में कैसे सपने देखें

किताबों के खिलौने के

पता है अम्मा के चौके में

चूल्हे पे चढ़ी बटलोई में

खदकते अदहन की आवाज़

आती है दूसरे तीसरे दिन

तभी कौंध जाता है एक सपना

भरे पेट सोने का -तिर जाती है मुस्कान

पर अक्सर ऐसा भी होता है

जब अदहन सूख जाता है

बटलोई में ही खदक के

और अम्मा की सिसकी से

जो आँचल मुंह में ठूसने पर

मुंह से बाहर निकल ही आती है

लाख कोशिशों के बावजूद भी

तब टूटता है जो सपना

हम माई बाबा को उसकी

भनक भी नहीं लगने देते

भूख को तो पानी पी कर

टरका देते है पर अब

तुम ही बताओ बाबू

पानी के बिना कैसे जियें ?

--------Divya Shukla----------