Sunday, 12 May 2013

हर दिन का बस एक पल मेरा हो


हर दिन का बस एक पल मेरा हो

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--------------- मुझे साल का एक दिन नहीं

------हर दिन का बस एक पल ही देते रहना तुम सब ------------

माँ हूँ तुम्हारी मेरी जान तुम् में बसती है

-------------मुझे पता है अब तुम सब बड़े हो गये हो

परिन्दे भी जब बसेरा बदलते हैं --------

-----तो पेड़ बहुत तन्हा हो जाता है ------

बच्चों से बड़ी तो कोई भी जागीर नहीं होती ----किसी माँ के लिये

पर मै ये भी जानती हूँ बहुत काम हैं तुम्हें ----पर क्या करूँ

-----मेरी जान तुममे बसती है ----माँ हूँ न --

तुमने कुछ खाया या नहीं --सोच कर ही

-----हाथ का निवाला गिर जाता है ---

लापरवाह हो न ---मै कैसे खा सकती हूँ बोलो ?

----तुम तो ड्राइव भी कितनी तेज करते हो ----

मै जब भी फोन करती हूँ ----जोर से हँसते हो

मम्मा मै बच्चा नहीं हूँ ----अच्छा अभी फोन करता हूँ

--------------फिर बिजी हो जाते --मै तो जानती हूँ तुम्हें ---

कभी तुम्हारा फोन न मिले तो ---तुम नहीं जानते

--------न जाने कितनी बार मर जाती है तेरी माँ ------

तेरी आवाज़ सुन कर जान मे जान आती है -----------

------रोज़ जब तक तू बिस्तर मे नहीं जाता --------

कहाँ सो पाती है माँ ----क्या करूँ दिल से मजबूर है तेरी माँ

----------मेरे लिये तो आज भी उतने ही बड़े हो तुम सब

जब पहली बार तुम्हें गोद उठाया था ---------------

------बस कुछ पल तेरे तेरी माँ की उम्र बढ़ा देते हैं --------

बस हर दिन के कुछ पल माँ के नाम करते रहना ----

---------------Divya Shukla-----------------

अपने बच्चो से हर माँ के मन की बात

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