Sunday, 12 May 2013

धीमी धीमी दस्तकें


धीमी धीमी दस्तकें

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चुपचाप रात् सरकती जा रही है

मै टैरेस पर निकल आई

सोचा नींद को आवाज़ दे कर देखूं

शायेद आ ही जाए पर न जाने कहाँ

भटक रही थी आज --रूठ के

शून्य में निहारती खड़ी हुई --

बीते वक्त को मन ही मन दुहरा रही थी

पर जिंदगी को जितनी बार भी जोड़ा घटाया

हर बार अपने हिस्से में शून्य ही आया

सामने मेरे हाथो से लगाया हुआ

मौलश्री का ऊँचा सा पेड़ खड़ा है --

आजकल छोटे छोटे सफ़ेद फूलों से भरा है

पर न जाने कहाँ खो गई है उसकी सुगंध

अरे ! मै भी तो इसी तो पेड़ की तरह ही हूँ न

इसमें जान तो है पर जड़ है यह

और मै भी तो ऐसी ही हूँ न

मेरी जड़े इस जमीन की गहराईयों में

अंदर तक जकड़ चुकी है की अब

चाह के भी एक कदम हिल भी नहीं सकती

पर कभी कभी लगता है कोई है

और दिल के बहुत करीब से

फिर एक आवाज़ आती है

सुनो ! तो मै हूँ न --

न जाने कौन है वो जो

धीमी धीमी दस्तकें देता है

एक अजीब सी बेचैनी और

बेखुदी में मेरे हाथ

बंद दरवाज़े तक बढते हैं पर

अचानक कदम ठिठक जाते हैं

तभी कोई कानो में धीमे से

फुसफुसाता है इतनी जल्दी

भूल गई तुमने वादा किया है न

मुझसे अगले जनम का ---

जिंदगी तो बीत ही जाती है

या यूँ कहो रीत जाती है ---

और फिर अगले जनम का

एक लंबा इंतजार शायेद भरम भी हो

बस सोच के मुस्कान तैर गई और

याद आ गया किसी से किया हुआ

एक वादा - अगले जनम का

पता है मुझे मजाक किया था

उसने पर सच में मै

मुस्करा जरुर दी थोड़ी शर्म भी आई

कुछ रिश्ते नेह के भी होते हैं

इतने सुंदर कि उन्हें

नाम की कोई जरूरत नहीं होती

-------Divya Shukla----------

12-5-2013

तस्वीर गूगल से साभार