Saturday, 18 May 2013

सुनो --देखो न


सुनो --देखो न

----------------------

आधे अधूरे ख्वाबों को

तो लपेट के रख दिया था

मन की चादर में --

अर्धनिंद्रा में ली करवट

चमक गई बगल की

खाली तकिया पे

मेरी सुर्ख लाल बिंदी

न जाने फिर क्यूँ कैसे

सपने चादर से फिसल

मेरी अधखुली पलकों पे

टंक गये ---

आंखे की कोर से

तनिक सा काजल ले

टीक दिया --तकिये पे

अब नहीं लगेगी --

किसी की बुरी नज़र

आँखे मूंद कर मैने

गहरी सांस ली

अहसास ही बहुत है

तुम्हारे होने का ---

-----Divya Shukla-------

18-5-2013

पेंटिग गूगल से