Tuesday, 7 May 2013

सुनो !! आज कह दो न --


सुनो ! आज कह दो न

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मौन निस्तब्ध रात -------

-----मै खुले आसमान के नीचे

देर से चाँद को निहारती बैठी हूँ ----

आकाश में तैरता हुआ -

आधा चाँद ऐसा लग रहा है

मानो नील नदी में तैरती

चांदी की नौका हो ----

रातरानी की भीनी सुगंध

मुझे खींच कर अपने पास

ले ही आई ----बहुत उदास है  मन

कुछ कुछ तुम से नाराज़ भी हूँ

--क्यूँ सताते हो मुझे ----

निठुर हो तुम निर्मोही

तुमने तो कहा था हमारा साथ

जन्मो का है पर कहाँ हो तुम

सिर्फ मेरी कल्पनाओं में ही क्यूँ

सुनो ! मेरी दोनों हथेलियों को

अपने हाथो में बंद कर कह दो न

तुम मेरे कौन हो --बोल ही दो

स्वप्न में या तंद्रा में ही सही

मुझे पता है कुछ नाते

परे होते है इस दुनिया से

और तुम मेरे वही मीत हो

बोलो न कनु हो न ?

न जाने कब से मै बाते कर रही थी

पता ही न चला अचानक उपर देखा

तो चांद मुस्करा दिया बोला उठो

चलो सोने अब रात्री का अंतिम पहर भी

बीत चला अब मै भी जा रहा हूँ --

चांद को विदा बोल मै उठ गई

सोच रही हूँ अब कुछ दिन बाद

अमावस्या फिर से आ जायेगी

और रातें सियाह होने लगेगी

तुम नहीं जानते कनु ?

एक बात बतानी है तुम्हे

रातों की ये काली सियाही -

इन्हें अब मै आँखों में

काजल की जगह आंज लेती हूँ

तुम्हे बहुत पसंद हैं न

मेरी काजल वाली आँखे

तुम जब भी चाहना

खुद को देख लेना

--------Divya Shukla-------

7-5-2013

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