Wednesday, 8 May 2013

सुनो !! रुकोगी नहीं

सुनो !!रुकोगी नहीं -?
-----------------------------
सुनो ! रुकोगी नहीं ?
नहीं नहीं कैसे ? अब नहीं
अब तो दहलीज़ पार कर ली
तुम्हारी बनाई लक्ष्मण रेखा भी
फिर मेरी जरूरत क्यूँ ------
बहुत कोशिश की तो थी मैने
पर हुआ क्या --क्या मिला
सिर्फ यही न तुम्हे तो अक्ल ही नहीं
बुद्धू हो न ---सड़क तक क्रोस नहीं कर पाती
तुम तो बिना मेरा हाथ पकडे ----अब क्या कहती
कर सकती हूँ मै ---तुम समझते क्यूँ  नहीं
मुझे तुम्हारा हाथ पकड़ना होता है न
बाइक पर पीछे बैठ बारिश में भीगना
उफ़ कितना अच्छा लगता है मुझे
क्या कभी जान पाये तुम --नहीं ना
तुम तो सिर्फ और सिर्फ झगड़ना जानते थे
याद है तुम्हे कितना डांटा था मुझे
कितनी छोटी सी बात थी
गाडी मोड़ते हुए तुमने कहा
हाथ दो --और मै कुछ देर सोचती रही
फिर झट तुम्हेहाथ थमा  कर कहा लो
कितना गुस्सा किया तुमने
अब इतनी भी अक्ल नहीं तुझे
खूब रोई थी उस दिन  मै --
मुझे ट्रेफिक रूल कहाँ मालुम
और फिर एक गहरा  निशान
और बन  गया  दिल पर
ऐसे न जाने कितने घाव होते रहे
अच्छी लड़कियां इतना हंसती नहीं
तुम हमेशा कहते --और मै चुप हो जाती
धीरे धीरे भूल गई खिलखिला के हँसना
परन्तु आजकल जो तुम्हे देख रही हूँ न --
तुम वो नहीं जो मेरे साथ होते हो
कोई गैर सा पुरुष ----कित्ता गुस्सा आया मुझे
नहीं जलन नहीं ---सिर्फ क्रोध वो भी खुद पर
ठीक कहा तुमने तुम पुरुष हो -----
--यह तो जायज़ है तुम्हारे लिए ---
सजावटी सामान ही तो थी मै
अच्छे शो रूम से लाई हई ब्रांडेड वस्तु
सोसाईटी में बगल खड़े होने के लिए
तुम्हारे वंश को बढाने के लिए
बिस्तर की सिलवटें बनाने फिर उन्हें मिटाने के लिए
लाइसेंस ले कर लाई हुई औरत ---
----ये सब करते करते भूल गई थी खुद को
नहीं अब नहीं ---सुनो ! तुमसे सिर्फ
एक सवाल का जवाब चाहिए दोगे
क्या तुमने जो किया --वह मै करती
तब भी तुम यही कहते मुझसे
रुकोगी नहीं ---नहीं ना --
फिर मै कैसे रुक सकती हूँ ----
सच सुन सकोगे --सुनो
बहुत कोशिश की पर तुम्हारे लिए
अब कुछ नहीं बचा मेरे पास
न --मन में --न ही जीवन में
कहते हैं न --प्रेम का धागा न तोड़ो
जोड़े से फिर न जुडे --जुड़े गाँठ पड़ जाए
कभी कभी तो मेरा दिल भी करता है
थोडा जी लूँ कुछ पल ही को सही
खोल दूँ मन के दरवाजे जिन पर जंग लग गई है
--------------Divya Shukla------------------

8-5-2013
पेंटिग गूगल से साभार


10 comments:

  1. नारी मन की अंतर्व्यथा का बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण...अंतस को छूती बहुत सशक्त अभिव्यक्ति..

    ReplyDelete
    Replies
    1. Kailash Sharma ji aap kaa hardik aabhar ..

      Delete
  2. मार्मिक चित्रण दिव्य जी बहुत खूब मेरे अंगना भी आएं
    2G, 3G ,CA G,जीजा G,मामा G,भांजा G,कब सुधरोगे G?

    ReplyDelete
    Replies
    1. सरिता भाटिया जी बहुत बहुत धन्यवाद --आपका आँगन बहुत सुंदर है हम अब आते ही रहेंगे आभार --

      Delete
  3. बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद आभार मदन सक्सेना जी ...

      Delete
  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद कालीपद प्रसाद जी --आपके ब्लॉग का अनुकरण किया है सुंदर ब्लॉग और लेखन के लिए बहुत बहुत बधाई

      Delete
  5. सुन्दर रचना

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया आभार ओंकार जी ..

      Delete