Saturday, 1 June 2013

सुनो ! मै गांधारी नहीं हूँ ...




सुनो ! मै गांधारी नहीं हूँ

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सदियाँ गुज़र गई समय बदल गया

पर तुम्हारी अपेक्षा वही रही

कहा न मै गांधारी नहीं हूँ

मै सीता भी नहीं हूँ ----------

सीता ने नहीं देखा किसी को

सिवा राम के ------

मैने तो सिनेमा के नायकों की

कितनी तारीफ़ तुमसे ही की

फिर तुम भी तो राम नहीं हो

मुझसे ये अपेक्षा क्यूं ??

मै औरत हूँ हाड़ मांस बनी

अपना अस्तित्व भी बचाने

की कोशिश कर रही हूँ

फिर अपना व्यक्तित्व

भी तो खोजना है मुझे

संबंधों का खेल ही तो है

रिश्तों का जंगल है

औरत का जीवन -----

रोम रोम पल पल का हिसाब

मांगा जाता है यहाँ

अगर नकार दिया तो हंगामा

मीरा को भी विष का प्याला मिला

कोई बोल उठी तो ------

बोल्ड और बेहया कहलाई

फिर क्यूं कहते हो ------

आजकल सब बराबर हैं

अगर है तो इतना हंगामा क्यूं

अभिव्यक्ति की आज़ादी तो

सब को होनी ही चाहिये ---

तुम तो जब चाहो जब तक चाहो

मुझसे मेरे मन से मेरी आत्मा से

खेल सकते हो मन न करे तो मौन

अगर यही मै करूँ तो --

थक गई हूँ मै अब और नहीं

मुझे अपने पाँव टिकाने को

ठोस ज़मीन चाहिये

एक टुकड़ा ही सही पर

अपना आसमान चाहिये

मुझे थोड़ा समझो तो

मेरे आंचल मे सिर्फ प्रेम है

इसके सिवा कुछ नहीं

पर झूठा नकाब नहीं ओढ़ सकती

अपने मान और अस्तित्व के साथ

मै तुम्हारी ही हूँ ---लेकिन

मै गांधारी नहीं हूँ ------

--------Divya Shukla--------

29-April-2012

पेंटिग -गूगल से
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10 comments:

  1. आज की नारी के मन की बात को सच्चाई से लिखा है ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया संगीता जी --

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  2. मुझे अपने पाँव टिकाने को
    ठोस ज़मीन चाहिये
    एक टुकड़ा ही सही पर
    अपना आसमान चाहिये.

    नारी के मनोभाव आपने बखूबी अपनी इस प्रस्तुति में समेटे हैं.

    बहुत बधाई दिव्या जी.

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    1. धन्यवाद रचना जी आभार आपका --

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  3. जितनी सामर्थ्य हो जीवन वैसे ही जिया जाये, किसी का उदाहरण ओढ़ने का क्या लाभ।

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    1. शुक्रिया प्रवीण जी -- आभार आपका

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  4. अभिव्यक्ति सामर्थ्य लिए एक सशक्त कविता

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    1. धन्यवाद अरविन्द मिश्र जी ---आभार

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कभी तो आदमी बन जाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने लिए बहुत बहुत आभार --आपका --

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