Wednesday, 12 June 2013

कुछ तुम करना कुछ मै ---



कुछ तुम करना कुछ मै

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कल अलसुबह आना

मै मुट्ठी भर सपने लाऊंगी

तुम उन्हें कांच सा तोड़ देना

बचे खुचे विश्वास को रेत में बिखेर देना

आंचल में भरी चांदनी पर रात उड़ेल देना

मै रात को सूरज में लपेट दूंगी

तुम दिन को सियाह कर देना

मै नीम की फुनगी पर चाँद टांग दूंगी

पत्तियों से छन के आती मध्यम रोशनी में

कुछ जोड़े घटाएंगे --ये भी तुम ही करना

मुझे जीवन का गणित नहीं आता

मन का बोझ उतार फेकना -----

रात आते ही तुम जहाँ चाहो चले जाना --

बिना कोई बोझ लिए अपने ज़मीर पे

मै आवाज़ नहीं दूंगी न अभी--- न ही फिर कभी

जाते जाते मेरा भरोसा मेरा विश्वास

मुझे लौटा जाना जो तुम्हे सौंपा था

--तुम बाकी जिंदगी आराम से सोचना

क्या खो दिया क्या पाया ---और मै

-मेरी बात छोडो----तुम नहीं समझोगे

ख़ैर छोडो जाओ भी अब --

मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की --

--------Divya Shukla---------

तस्वीर गूगल से साभार

12 comments:

  1. सपने अपने इतने विस्तृत,
    जिनमें गगन समाये विधिवत।

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    1. प्रवीण पाण्डेय जी ---धन्यवाद आपका आभार

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  2. जीवन और प्रेम के गहन संवेदन भाव को व्यक्त करती सुंदर रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है- पापा ---------

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    1. प्रतिक्रिया लिखने के लिए प्रोत्साहित करती है आपका हार्दिक आभार --Jyoti Khare ji ---

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  3. वाह.......अति सुन्दर ।

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    1. इमरान अंसारी ---शुक्रिया आभार रचना पसंद करने के लिए

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  4. उत्कृष्ट प्रस्तुति

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आभार ---संजय भास्कर जी

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  5. बहुत सुन्दर ।

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    1. शुक्रिया आभार ---Darshan Jangara ji

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  6. बहुत सुन्दर ।

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    1. आपका हार्दिक आभार धन्यवाद --Darshan Jangra ji

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