Thursday, 20 June 2013

दो राहें -- दो चेहरे -एक देखा एक अनदेखा----




दो राहे -- दो चेहरे -एक देखा एक अनदेखा

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आईने के सामने न जाने कब से खड़ी

पर अपना चेहरा नहीं देख रही थी

अपनी ही आँखों में झलकता

वो अनदेखा चेहरा खोज रही थी

जो मुझ में ही कहीं गडमड हो गया है

जिंदगी की राह में मोड तो बहुत से आये

पर कुछ दोराहे ऐसे भी थे ---

कुछ अजीब  असमंजस में  पड़ी

जहां कुछ पल को ठिठक गई मै

किधर जाऊं कड़ी धूप चुनूँ या फिर

घुटने टेक कर ठंडी छाँव वाला रास्ता

जिंदगी तो सहल हो जाती पर---

जमीर के साथ साँसे भी गिरवी रखनी पड़ती

दूसरा रास्ता गुजरता हर पल जीवन की

कठोर  परीक्षा कड़ी धूप और

राह में बिछे नागफनी के कांटो के बीच से

मैने दो पल लिए निर्णय लेने में --

चंद शब्द और एक ठोकर से

बंद कर दिया पहला रास्ता और

वो देखा हुआ चेहरा जो कभी

जाना पहचाना था उसका अक्स ही

निकाल फेंका एक गहरी सुकून भरी सांस ली ----

और फिर चल पड़ी स्वयं की चुनी राह पर ----

--साथ में था वो अनदेखा चेहरा

जो मेरा संबल था --कठिन राह में

जिसकी प्रतीक्षा मुझे जन्मो तक रहेगी

मुझे भी नहीं पता वो कौन है ---

मेरी ही कल्पनाओ में बसा वो अनदेखा वजूद

कभी कभी सोचती हूँ --कैसा अजीब शख्स है

जो है भी और नहीं भी ---------

पर जिंदगी गुजारने के लिए बस इतना ही बहुत है

न जाने किसका ये शेर याद आता है --

जब भी सोचती हूँ मै --

(वो ख्वाब बन के मेरे चश्मेतर में रहता है

अजीब शख्स है पानी के घर में रहता है )

है न अजीब सी बात ---इसी लिए तो कहती हूँ

मै हूँ ही नहीं इस दुनिया की ----

------------Divya Shukla--------------

20--June -2013

पेंटिग गूगल से साभार —