Wednesday, 5 June 2013

जिंदगी के बेतरतीब पन्ने ----





जिंदगी के बेतरतीब पन्ने ----
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रात गहराती जा रही पर नींद कोसों दूर
भारी होती अधमुंदी पलकें -फिर से कहीं डूबने लगी
अतीत के पन्ने फडफडा के इधर उधर उड़ने लगे और मै ?
मै तो उन्हें भाग भाग कर समेटती रही ---वो दस्तावेज़ है
हर पन्ने पर कुछ न कुछ दर्ज है ----हाथ में थामे कहीं खो गई
वो दिन भी बड़ा आम सा दिन था सुबह सुबह स्कूल जाना था
बहुत आलसी थी नींद बहुत प्रिय और सुबह सुबह जगाने वाली
माँ बिलकुल कड़क जेलर लगती थी --माँ ने आवाज़ दी बस आती होगी
उठ जल्दी तैयार हो --- टावल उठा वाशरूम में गई और सो गई उसे वहीँ बिछा के
निकलो जल्दी करो मम्मा की आवाज़ आई पता नहीं ये लड़की क्या करेगी
बाबा बोलो तुम क्यों उसको डांटती रहती हो ---अरे कहाँ ब्याहोगे इसे
खूब बिगाड़ दो कौन करेगा इससे शादी एक तो कुछ नहीं आता
उस पर रंग भी सांवला --बस यही सुन कर मुंह लटक गया उसका
बाबा बोले अभी दसवीं में तो है -- और कितनी सुंदर तो है खबरदार मेरी बिटिया को
ऐसा कहा ---अभी से देखो रिश्ता मांग रहे है --माँ को झटका लगा बोली अरे हमारे यहाँ
कब ऐसा रिवाज़ है लड़की मांगने का सौ तो नखरे होते है इन लड़केवालों के
मेरी बेटी है मुस्करा के बाबा बोले --पर इसे कोई अक्ल भी तो नहीं क्या करेगी जा कर
अभी पढाई भी तो करनी है दसवी में ही तो है पढ़ने में भी अच्छी है
दो तीन साल बाद करते शादी वो लोग उनसे कहिये इंतजार कर ले ------
-देखो आज आने वाले है बात करता हूँ उनसे बाबा ने कहा -----
स्कूल के लिए तैयार होते हुए वह चुपचाप सुन रही थी --और मन ही मन खुश हो रही थी
अच्छा है रोज रोज डांटती है फुरसत मिलेगी इनसे -- अक्सर माँ का थप्पड़ पड़ता तो वो
यही सोचती हे भगवान इतनी दूर मेरी शादी करवा दो तब इनको पता चले खूब याद करे मुझे --अचानक बस का हार्न बजा और भागी बैग ले कर नाश्ता भी नहीं किया अक्सर ऐसा ही करती थी --वापस आकर देखा तो लगा कोई आया था माँ बाबा से बात कर रहा था वो अक्सर आते थे पर ऊपर नहीं आते बस नीचे ही गेस्ट रूम में रहते ---शायेद चार पांच साल की थी तब से ही आते थे --जैसे वहाँ खड़ी हुई माँ ने कहा तुम अंदर जाओ ---भाभी से बोलो चाय भेज दे ---भाभी ये मोटू गोलू आज बड़े वी आई पी क्यों बने है मां तो कभी इन्हें ऊपर नहीं बुलाती थी ------------ म शरारत भरी मुस्कान भाभी के चेहरे पर तैर गई --अब गोलू न बोलना इन्हें ---
ये तेरी शादी की बात करने आये है ---लड़के के सगे मामा हैं
क्यों इस गोलू को क्यूँ इतनी चिंता है मेरी चिढ के मै बोल पड़ी ----
बाद में पता चला सच में मामला सीरियस हो गया बात आगे बढ़ने लगी
एक दिन मेरी हिटलर मम्मा ने मेरी फोटो भी खिंचवा दी धोखे से उन्हें पता था
ये शैतान की खाला सीधे न मानने वाली ---- पता क्यूँ अजीब सा लगा मुझे
बाबा माँ दोनों ही तीन साल बाद शादी करना चाहते थे पर वो अजीबोगरीब लोग थे
जिन्हें ये झल्ली सी बेवकूफ लड़की पसंद आ गई जिसे कोई सहूर नहीं था
न खाना बनाना न घर रखना कुछ नहीं आता सिर्फ और सिर्फ कुत्ते पालना आता था
वो मामा थे लड़के के सगे --खूब समझाया और आखिर तैयार कर ही लिया शादी को
बाबा ने कहा अभी पढ़ रही है दसवी में ही तो है कुछ नहीं आता उसे
अंत में मान ही गये मेरे माँ बाबा -----
एक रोज भाभी बोली तुम तस्वीर तो देख लो लड़के की --चिड़चिड़ा के मै जोर से बोली
नहीं मुझे नहीं देखनी कोई फोटो अब शादी तो ये लोग कर ही देंगे न इसीसे
--अगर मुझे न अच्छा लगा तो ? क्या नहीं करेंगे --फिर क्यूँ देखूं ---और फिर दसवी का पेपर खत्म हुआ और शादी की तारीख भी आ गई -- माँ को चिंता थी साड़ी पहननी नहीं आती घर का कोई काम नहीं आता
स्कर्ट पहनती थी वह और सारा दिन छोटे भाई बहन के साथ ऊधम मचाना
बस यही काम था --स्कूल की कुछ शरारती स्टूडेंटस में से एक थी वह
--पेड़ पर चढ कर टिफिन खाना --टीचर्स के नाम रखना ---पर उसे प्यार भी करती थी
उसकी टीचर्स और सहेलियां -- पर सब को बड़ा धक्का लगा इसकी शादी अभी होगी
ये तो ससुराल में भी ऐसे ही खेलेगी और शैतानी करेगी -------
घर में माँ ने सख्त आडर्र दिये आज से दो रोटी ये बनाएगी हाथ जलने पर उस दिन
उसे पक्का लगा ये मेरी सगी नहीं सौतेली माँ है -- बाबा कहते थे नहीं बनाएगी खानामेरी बेटी ---- पर माँ के आगे नहीं चलती उनकी --आखिर वक्त करीब आ ही गया ब्याह का
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दूसरा पन्ना
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उसे कोई फ़िक्र नहीं कोई मतलब नहीं गहने जेवर से वो तो बस सहेलियों और फिल्मो से बस इतना जानती थी अब माँ कभी नहीं डांटेगी --और मेरा दूल्हा मुझे बहुत प्यार करेगा जैसे फिल्मो में होता है -- कुछ शरद के नायकों जैसा --इस बीच सब छूट थी उपन्यास पढ़े कुछ दिन की मेहमान जो थी ---बहुत बेहोश सोती थी पर अक्सर रात को अचानक जाग जाती
सोते में ही अक्सर चेहरे पर गिरी बूंदो से आँखे खुल जाती -पर जान कर सोई रहती
बाबा रोज आते उसके पास अक्सर देर रात को लौटते मीटिंग्स से या क्लब से
---वो तो सोती ही मिलती उन्हें ---बहुत प्यार करते थे उससे ---
बेटी में प्राण बसते थे उनके कभी जोर से भी नहीं बोला उन्होंने --इस बीच सारे भाई बहन एक ही पलंग पर घुस के सोते थे जैसे वक्त को अहसास को स्पर्श को स्नेंह और वात्सल्य को सहेज़ रहे हो ---अब तक माँ को छोड़ किसी की तेज आवाज़ नहीं सुनी थी --- सबसे छोटा भईया उससे लिपट कर सोता था खूब रोता वो कहता मै किसके साथ सोऊंगा तुम मत जाओ न -- उसे भी लगने लगा था छूट रहा है सब -- डर भी लगता जब बाबा के गाँव से आई दीदी जो उसे बहुत प्यार करती थी अक्सर कहती बहिनी सास के पूंछ होती है उसी से मारेगी तुम्हे अगर ठीक से नहीं रही रोज रोज कोई न कोई उपदेश देता --आखिर वो दिन आ ही गया जब लग्न की तारीख रख दी गई ---माँ सहजने लगी थी बेटी समान --- -----------------
दोनों बड़े भईया छुपा के रोते और वह मुंह फाड़े उन्हें देखती अब वो गाना भी खूब सुनते मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया ---आजकल उन्हें चिढाने वो मजा भी नहीं रहा वो चिढते ही नहीं थे अब --- बीच में लड़की देखने की बात का जिक्र हुआ तो -बाबा ने ही कह दिया हम लड़की नहीं दिखायेंगे वो स्कूल जाती है देख ले जिसे देखना हो पर उसे पता न चले बाबा बड़े पज़ेसिव थे मुझे लेकर वो कहते थे मेरी बेटी कोई तमाशा नहीं जिसे नुमाइश की तरह दिखाए जिसे शादी करना हो मेरी बेटी से करे नहीं तो न करे ----पता नहीं कब आ कर उसे देख भी गये और पसंद कर तारीख भी पक्की हो गई -----तिलक की रस्म हुई पेपरों में खूब जिक्र हुआ --बड़ी शानशौकत से बाबा ने तिलक चढाई खूब खुश थे लड़का बहुत हैन्डसम है बिलकुल राजेश खन्ना जैसा ---पर माँ का चेहरा बहुत खुश नहीं दिखा न जाने क्यूँ -------------शादी का दिन भी आ गया -------------
बारात दरवाजे आ ही गई तीन चार हज़ार लोग थे -- किलोमीटर्स लंबी पार्किंग थी पर जिसकी बारात आई थी उसे कोई परवाह नहीं वो तो सो रही थी लंबी तान के----- जयमाल हुई ही नहीं माँ ने मना कर दिया बस ऊपर बालकनी से दुल्हे और बारातियों पर अक्षत जौ और न जाने
क्या फेंकने की रस्म होनी थी इसमें दुल्हन की आँख मूंद कर ले जाते हैं
--भाभी उसे ले गई --कान में चुपके से बोली आँखे खोल रही हूँ देख लो अपना दूल्हा--- धीरे से आँखे खोल देखते ही वो बोल उठी भाभी सुनो ये है ??? चुप चुप कह उसका मुंह बंद कर अंदर ले आई --और कमरे में उसे छोड़ कर बोली सो लो थोडा जागना है पूरी रात -
सबसे मजे की बात तब हुई जब उसका नन्हा सा भाई जो बस पांच साल का होगा उसे पता चला आज दीदी को खाना नहीं मिला --आज व्रत रखवाया था गांव से आई बड़ी अम्मा और भौजी लोगों ने --ये एक और जुल्म था --नन्हा भईया चुपचाप दो कचौड़ी ले आया दीदी खा लो चादर ओढ़ कर तुम चुपके से
तुम्हे भूख लगी है न -मै बाहर खड़ा हूँ और दीदी ने खा भी लिया उसे सच में भूख लगी थी जिसे
शादी का मतलब नहीं मालुम वह इन व्रत के बारे में क्या जाने ------
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तीसरा पन्ना
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आखिर वो दिन आ ही गया ---जिस दिन ने उसे उसका जीवन सब बदल दिया
आखिर बारात आ ही गई पांच हाथी भारी भरकम बारात -- वी आई पी घराती --कई शहरों के आफिसर डी एम् --एस पी --सभी वही डटे थे दिल्ली से लखनऊ तक के मंत्री नेता सभी वर्ग के लोग थे ---बाद के कई वर्षों तक चर्चा का विषय रहा यह विवाह --कितनी अजीब बात है जिसका विवाह हो रहा था वह तो अच्छी तरह से रिश्ते भी नहीं जानती थी लेकिन
भाग्य का लेखा कहाँ कौन बदल पाया --पढ़े लिखे माँ बाप भी नहीं सोच सके वो
क्या कर रहे है ------और फिर शुरू हुई वो सारी रस्मे जिसने पूरा जीवन बदल दिया उसका
देर रात को शादी शुरू हुई --नींद के मारे दुल्हन का बुरा हाल उसे ये भी नहीं पता कब क्या रस्म हुई नाउन को टेक लगा के मज़े से सो रही थी --- न ही दुल्हे में कोई रूचि न ही ससुराल से आये भारी भरकम चढाव में बस सोने दो --कभी नई नई छिदी नाक में पहनी बड़ी सी नथ जब खींचती तो आँखे खुल जाती ---वरना घूंघट में मज़े से सो रही थी-तब भी जब कन्यादान हुआ उसका
हाथ पकड़ के अजनबी के हाथ में थमा भी दिया अपनी आधी सोई आधी जागी बेटी का माँ बाबा ने ---पाँव भी सो गये थे जब सात फेरे हुए वो तो बस चल रही थी सप्तपदी का तो उसे अर्थ ही नहीं पता था न ही सातो बचन सुने --कभी कभी सोचती हूँ क्या शादी थी जब कुछ पता ही नहीं क्या हुआ --मानो गुडिया की शादी हुई हो ----कभी कभी सोचती हूँ जब पूरी शादी सोई थी तो
बचन किसने भरे सप्तपदी के एक एक फेरे का अर्थ कहाँ जाना फिर कैसी शादी
जिसका कोई महत्व उसे नहीं पता कैसा बंधन है कुछ तो नहीं जानती थी ----
वो सब तो वह बाद में जान पाई जब अपने भाई बहनों के विवाह की पूरी रस्मे देखी
दुल्हन की आँखे और दुल्हे के मन की पुलक देखी बहुत गुस्सा भी आता जब भी सोचती
माँ बाबा ने अपना भार उतार दिया ---बस पूरा हुआ उनका काम --अब बाबा के घर से
बिदा की बेला भी आई माँ ने खूब समझाया कोई शिकायत न आये तेरे बाबा की इज्जत अब तेरे हाथ में है --- सुबह उठ कर सब के पैर छूना जो कहे मानना --अगर गलत कहें तो भी मानू ? वो बोल पड़ी नहीं बेटा वो अब तेरा घर है अब वही रहना है --और खूब रोई माँ -- फिर बोली बाबा के सामने ज्यादा न रोना बेटा तुझे पता है वो हार्ट पेशेंट है ---बस इसी डर से बाबा के सीने से लिपटी वह बस सिसक सिसक के ही रो पाई भीग गया बाबा का कुर्ता बेटी आंसुओ से --कार को हाथ लगा कर भाई बिदा करता है बड़ा भईया अंदर आकर बोला सुनिए मेरी बहन को कभी डाटना नहीं वो गलतियां करती है उसे अभी कम अक्ल है और उसे लिपटा लिया बहुत रोये दोनों भाई बहन ---उस छण लगा ---क्या छूट गया ---शायेद बहुत कुछ
उसका सब कुछ तो यही छूट गया ---बस वही पर रुक गई जिंदगी वही ठहर गई उम्र
उसके अंदर की वो ही लड़की अभी भी जिन्दा है कितना भी डाटो बड़ी ही नहीं होती ---मन से उम्र वही ठहरी है ---हो सकता हैबस वो जिंदगी उसकी अपनी थी ---जो वही रुकी है
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चौथा पन्ना
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कार ससुराल की ओर बढ़ चली अब वो सिसकती रही अब लगा सब छूट गया
नए घर में दुल्हन का स्वागत बहुत धूमधाम से हुआ --दर्जनों आरती के थाल सजे थे
फूलों से पूरा परिसर सजा था --पर वो बहुत घबराई थी उसने सुना था ससुराल में गोरी दुल्हन की सब तारीफ़ करते उसे बस इतनी चिंता थी कि अब क्या होगा वो सांवली थी गेहुआं रंग था ---माँ बाबा से उसने कहा था किसी ने कहा मुझे काला मै झट वापस आ
जाउंगी ---बाबा ने उसके ससुराल जाने से पहले टेलीफोन लगवा दिया वो भी सेंटर मिनस्ट्री से कह कर गांव था वह वहाँ न टेलीफोन था ना ही दरवाज़े सडक
मेरी बिटिया को झटका लगेगा इसीलिए शादी की बात शुरू होते ही दोनों काम करवाए
अब फोन तो था ही पहुँचते ही बाबा ने बात की माँ ने कहा कुछ माँगना मत किसी रस्म पे तुम्हारे बाबा को लोग कहेंगे कैसी बेटी है इनकी --और फिर कभी कुछ नहीं माँगा उसने ----चार दिन ही रही वो वहाँ कुछ अक्ल नहीं थी साड़ी पहनना नहीं आता वो बड़ी ननद पहनाती उसे
कीमती जेवर टूट जाते गिर जाते उसे कोई परवाह नहीं एक दिन हार का टुकड़ा गिर गया
सब खोजने लगे वो बोल पड़ी पूरा तो है बस जरा सा ही तो गिरा है जाने दीजिए
हार के टूटे टुकड़े तो जुड गये दूसरे बन गये किन्तु वो कुछ टूटा जो कभी नहीं
जुड़ा वो जिसके हाथ में बाबा ने बड़े प्यार से सौंपा था उसे उसने ही उसका कांच सा मन तोड़ दिया ---पांचवे दिन बेटी विदा कराने आये अपने पिता से लिपट बहुत रोई और बोली नहीं रहना मुझे यहाँ से ले चलो --ले चलेंगे पहले पूछ तो ले फिर मुहूर्त निकलने के बाद पांचवे दिन वो वापस मायके आ गई --- पर अब अलग सा लग रहा था कुछ उसे --वो सोच रही थी
ऐसा क्या बदल गया ---
सब ऐसे ट्रीट कर रहे थे मानो मेहमान हो वो ---अंदर तक अजीब सा धक्का लगा उसे क्या
चार दिनों में पराई हो गई मै ---बस यही सोचती रही वह ऐसा क्यों होता है ---
मेरे माँ बाबा मेरा घर यही बड़ी हुई और यही अब मेहमान हो गई -----
नींद नहीं आई खुली आखों से अतीत के झरोखों में झाँक आई और
न जाने कब तक यही सोचती रही -- रात बीत गई आज फिर बाबा बहुत याद आये
आज फिर कई जख्म हरे हुए ---- आज फिर रात भर आँखे बहती रही तकिया भीग गया आँसुओं के दाग सुबह सब बता देंगे ---सबको ------एक पल भी तो नहीं सोई आज
जबकी आज डबल डोज़ ली थी नींद की --सूरज खिडकी से झाँक रहा है काल बेल घनघना उठी रोज के काम शुरू अब ---बाकी पन्ने फिर कभी
----------------------------Divya Shukla-----------------------------
6-6-2013

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