Saturday, 8 June 2013

पर अब मै मुड़ के नहीं देखती




पर अब मै मुड़ के नहीं देखती

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बरगद के पेड़ पर लिपटते

मौली के कच्चे लाल धागे के

हर चक्कर के साथ ही --

प्रेम का बंधन मजबूत होता है

ऐसा सुना है --क्या सच है ?

सोलह श्रृंगार में सजी हर उम्र की

सुहागनें दमकता मुख मंडल

आँखों में चमक ये श्रृंगार की नहीं

प्रेम की है विश्वास की है --

जो बांधती है वो बरगद के तने पे

हर चक्कर के साथ --

बिहंस देती है मन में हुलास लिए

पीछे चलते हुए प्रिय को देख

मुझे पता है तुम्हे नहीं विश्वास

इन पर रस्मो पर न उपवास पर

उपहास था तुम्हारे लिए ---

मेरा करवाचौथ का चाँद पूजना

तभी तो छोड़ दिया मैने सब

चाँद तो अब भी मेरे साथ है पर

अब मै  उसकी प्रतीक्षा

 सोलह श्रृंगार में नहीं करती

बरगद का तना बस छू कर

अपनी दोनों बाहों में भर कर

वापस आ जाती हूँ -बस

इन छोटी छोटी रस्मो में

कितना कुछ छुपा होता है

अपने सुहाग की लंबी उम्र

की कामना -----

ढेर सारा प्यार और जन्म जन्म

तक साथ निभाने का विश्वास ----

ख़ैर जाने दो अब क्या फायदा

अब तो बस ---मै देखती हूँ

आँखे मूंद कर कल्पना तो करती हूँ

लाल कच्चा सूत बरगद का पेड़

सोलह श्रींगार में मै --पर

धागे का दूसरा सिरा कोई  थामे है

या   नहीं  --- ---

 अब पलट कर मै नहीं देखती ---

-------Divya Shukla----------

8-Jun-2013

तस्वीर  गूगल से

6 comments:

  1. काश बँधने वालों को बरगद सा व्यक्तित्व मिल सके।

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    1. बरगद की घनी शीतल छाँव जैसा व्यक्तित्व --मिलने की कामना किसे नहीं होती ----आभार आपका ---प्रवीण पाण्डेय जी

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  2. बरगद जैसा व्यक्तित्त्व अदभुत है.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  3. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक प्रस्तुति,आभार।

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    1. राजेन्द्र कुमार जी ---हार्दिक धन्यवाद आभार --रचना सरहाने के लिए प्रतिक्रिया लिखने का हौसला देती है ----आभार

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    2. Rajendra Kumar ji aap kaa hardik aabhar --shukriya

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