Wednesday, 26 June 2013

काश मै तुम्हारा मन पढ़ पाती



काश मै तुम्हारा मन पढ़ पाती

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मुझे मनोविज्ञान का

जरा भी ज्ञान नहीं

वरना पहचान न लेती

तुम्हारे दोहरे स्वरूप को

तुम्हारे निठुर मन को

पढ़ न लेती --नहीं पढ़ पाई न

न जाने कब तुम्हारी धडकनों का अहसास

मेरी आत्मा में कितने गहरे तक पैठ गया

मुझे तो पता ही न चला -------

आसक्ति और अनासक्ति के

जुड़वां रूप हो तुम मेरे लिये

मेरे आक्रोश का स्वर भी जो मेरे ही

भीतर गूंज कर मौन हो जाता है

और फिर वही नरम संगीत ---

तुम तो ऐसे नहीं हो सकते ----

न जाने क्यूं मुझे तो यही लगता है

बिना पूछे सीधे मेरी आत्मा में बस गये

और फिर न जाने कब उठ कर चल दिये

एक यायावर की भांति ----न जाने किस ओर

किलस के रह गया था ये मन ------

फिर भी कभी क्रोध नहीं आया तुम पर

मै प्रतीक्षा करुँगी अंतिम छण तक

तुम आओगे जरुर पता है मुझे

चाहे इस जीवन के अंतिम पल में

या फिर अगले जन्म में नए कलेवर में

क्यूं की कुछ नाते देह की परिभाषा से परे होते है

वो अंतरात्मा की गहराइयों में उतर जाते है

पता है हमें मंजिल तक जाना है

तुम तो बहती हुई नदी की तरह हो और तुम्हें बांधना

प्रेम को जड़ करना हुआ --- चलो जाओ मुक्त हो कर

पर याद रखना तुम्हें आना है वापस मेरे पास

मेरे लिये मुझे लेने ---- हमेशा के लिये

तुम्हारा हाथ थाम कर ही तो जाना है न

मुझे छितिज के उस पार किसी और जगत में

उन ओस की बूंदों से निर्मल पलों के साथ तुम्हारी प्रतीक्षा में

जो कभी तुम्हारे साथ गुज़रे थे मेरी अपनी ही कल्पनाओं में

देखो न मेरा सारा आक्रोश मेरा मान सब

न जाने कहाँ खो गया सिर्फ तुम्हें याद भर करने से

-----------Divya Shukla--------------

27-- June --2013

पेंटिग गूगल से साभार