Monday, 1 July 2013

अब तुम तो जानते ही हो न ----

तुम तो जानते ही हो न ---

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मौलश्री की सुगंध आज भी

हर पूर्णिमा को महकती है

अनजाने मे कदम फिर से

नदी तट पे पहुँच जाते

जल मे चांद के प्रतिबिम्ब मे

फिर तुम को खोजते हैं

अब तुम वहाँ नही आते ---

पर वो पूर्णिमा याद आती मुझे

वो पूरे चांद की रात

महक रही थी मौलश्री से

चांद का प्रतिबिम्ब --

इठला रहा था नदी के जल में

तब तुम थे हम थे

निस्तब्ध रात थी

तुम मौन मुस्करा रहे थे

सुन रहे थे धैर्य से मेरी

न खतम होने वाली बातें

मुझे आदत है जोर से हँसने की

और तुम्हें सिर्फ मुस्कराने की

हमारे साथ चांद मुस्कराता

और चांदनी खिलखिलाती थी

पर आजकल सब उदास ---

तुम जो नहीं हो यहाँ -------

अजनबी से बन गये न जाने क्यूं

सुनो ! ज़रा बाहर झांको न

देखो तो - चांद से संदेश भेजा है --मैने

तुम जल्दी आना ---

नदी -चांद -चांदनी सब उदास है

मौलश्री अब ज्यादा नहीं महकती

तुम्हारे बिना ----और मै

क्या कहूँ ?---तुम तो जानते ही हो न

---------Divya Shukla-----------

1-7-2013

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