Sunday, 7 July 2013

तुम यहीं हो उलझे सुलझे से मुझ में ही कहीं हो



तुम यहीं हो उलझे सुलझे से मुझ में ही कहीं हो

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मन के छुपे कोने से न जाने कब

आज फिर निकल आया बहुत याद आया

वो बिखरे बालों वाला कुछ उलझे ख्यालों वाला

खुद में गुम सा रहता कभी दूर छितिज को तकता

वो न जाने कब तक बैठा रहता --मानो सूरज के साथ

मिल वो सपने बुनता बेतरतीब सी उसकी कमीज

आधी बाहर निकली रहती अक्सर ही तो

मै खिलखिला कर हंस देती वो चिढ जाता

घंटो न मानता घूर के देखता रहता

बस अपनी बोझिल पलकें उठा के

और मै -- मै तो बस्स्स्स उन उलझे बालों में

अपनी उँगलियाँ फंसा के उन्हें सुलझाते हुए

कब उसे भी मना भी लेती पता ही न चलता

अपने पाँव की ठोकरों से पत्थरों को मारते हुए

न जाने कब वो कहाँ खो गया पता ही न चला

पर आज भी वो यही है यहीं कहीं है

उलझे ख्यालों वाला बिखरे बालों वाला लड़का

मेरे आसपास मेरे अवचेतन मन के किसी कोने में

कभी कभी सोचती हूँ तुम बदल तो नहीं गये होगे

तुम्हे तो पता है मुझे बस ऐसे ही पसंद हो तुम

बस बिखरते रहो और मै समेटती रहूँ तुम्हे

तुम्हारा एकटक देखना उफ़ क्यों नहीं समझते तुम

मुश्किल होती है न नहीं कर पाती फिर कुछ मै

दहक उठते है अंगार से चेहरे पर आज भी याद करके

तभी तो कह रही हूँ तुम यही हो यहीं कहीं हो

जा ही नहीं सकते कहीं --कहाँ रह पाओगे मेरे बिना

कौन करेगा तुम्हारे वो सारे काम मेरे बिना जो तुम

जानबूझ के फैला जाते हो --उफ़ हद है ये भी कोई प्रेम हुआ

बड़े मान से बोलते हो मै तुम्हारे बिना रह ही नहीं सकती

हाँ हाँ क्यूँ नहीं जन्मजन्मांतर का करार जो है ---

चलो हटो जाओ भी ---तुम तो बस यूँ ही हो

मुझे पता है ----यही कहीं हो कभी कहीं गये ही नहीं

बस मुझे खीजते देख मुस्करा रहे होगे हमेशा की तरह

----------------Divya Shukla-----------------

8--july -2013

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