Friday, 2 August 2013

सुनो -- तुम सुन रहे हो न --


सुनो -- तुम सुन रहे हो न

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उफ़ -- यही तो रहा बस हमेशा से

जब हमनें कुछ भी कहा-----

------ तुम सुन ही नहीं पाये

या अनसुना करते रहे -----

------जान कर सच कह रहूँ न

अब देखो न --- हम कहाँ पे आ गये

----दरकने लगे रिश्ते ------ठीक उसी तरह

जैसे तुम्हारे हाथ से ----फिसल रहा है

------धुला हुआ --------काँच का ये गिलास

सुनो --चलो एक कोशिश और करते हैं

--- कांच से नाज़ुक रिश्ते को संभालने की

मै भी हाथ लगा देती हूं -----न ये गिलास टूटेगा

-----न ही अब हमारा रिश्ता -----------

एक मौका --एक कोशिश और सही

----------फिर कोई गिला नहीं रहेगा

हमने कोशिश तो की ही ----

-------तुम सुन रहे हो न मेरी बात

या फिर से वो ही पुरानी आदत

---- उफ़ मुझे इसी बात से तो चिढ़ है

बस ये आखिरी बार --फिर तो ---

----------Divya Shukla------------

2-8-2013

तस्वीर गूगल से