Sunday, 11 August 2013

माँ और मायका ----



माँ और मायका --

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माँ और मायका इनकी याद की तो

हर औरत के पल्लू में गाँठ सी बंधी होती है

यह गिरह न निकलती है और न ही कभी ढीली पड़ती है

कहने को एक छोटा सा लफ्ज़ है माँ -

लेकिन इसके कहने से दिल को जो सुकून मिलता है

वह यूँ महसूस होता है जैसे कड़ी धूप में ठंडी छाँव हो

ऐसा ही घना दरख्त है माँ ---

हमारी माँ जिनको आज हमारे सहारे की ज़रूरत है

उम्र के इस दौर में कितनी अशक्त हो गई माँ बीमार भी

सहारा ले कर चलती है ---अक्सर मुझे नींद नहीं आती

पर माँ पास होती है उनका हाथ पकड़ के आज भी सो जाती हूँ

कोई दवा कुछ नहीं घर का गेट बंद है या नहीं इसकी भी फ़िक्र नहीं

हम हर फ़िक्र से निश्चिन्त होते है पास में सोई हुई माँ होती है ना

कितने सुकून की नींद आती है --माँ को चिढाते छेड़ते उनसे डांट खाते

आज हर पल ये भी लगता है न जाने कब ये चुपके से हाथ छुडा लें

आज बहुत याद आया मायका और अपनी मम्मी

नागपंचमी आज जिसे हमारी तरफ गुडिया भी कहते है

माँ हमारी हथेली में मेहंदी लगाती दियासलाई की तीली या

सींक से मेरी फरमाइश होती मोर चिड़िया बना दो मम्मी

और वोह कुछ भी लगा देती हरा फ्रोक बनाती खुद से

बहुत गुणी है माँ बिलुकल डिजायनर सिलती --

बहुत कम रही माँ के साथ सिर्फ पन्द्रह साल की उम्र तक

उसके बाद कभी नागपंचमी पर हमने मेहंदी नहीं लगाई

कल नींद नहीं आई हमें बहुत सोचते रहे -- सुबह माँ को फोन भी किया

आ जाओ न हमारे पास तुम्हारा हाथ पकड़ कर सोना है हमें

जब से तुम गई हो सो नहीं पाई गहरी नींद --डांट लेना जितना चाहो

हम बदले नहीं वैसे ही दुष्ट है पर आ जाओ न माँ हमें नींद नहीं आती

-------------------Divya Shukla-----------------------

11-8-2013

स्केच  गूगल  से  साभार