Monday, 12 August 2013

प्रतीक्षित हूँ ---बोलो न -----



प्रतीक्षित हूँ ---बोलो न

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मेरे सपने किसी भी परिधि से परे हैं

धरा से अम्बर तक -सागर की अनंत गहराईयों से

दूर छितिज तक ---अद्धभुत है विलक्षण है

समझ से परे है क्यूँ की वो मेरे है

जीवन की उलझनों के बीच वो पलते है

मेरी आँखों में -- टूट नहीं सकते कभी

वो मेरे है न --उन्हें समझने के लिए

तुम्हे मेरी आँखे मेरा मन बनना होगा

खोलना होगा ये बंद मुट्ठी --------

इनमें बंद है उन सपनो का भ्रूण

जिसे सहेज़ रखा है मैने ---------

-------अजन्मे बच्चे की भाँति

पोसना है अभी उसे ----------

------- धरा से खींच के

आकाश तक फैलाना होगा -----

-------काश ये समझ पाते तुम

सपने केवल स्वप्न बन के ही न

----रह जायें ---उन्हें यथार्थ में

बदलना भी मेरा सपना है ------

-----कर सकोगे तुम ? यह सब

चल सकोगे मेरे साथ ?------

सुनो ? अनुत्तरित न छोड़ना

प्रतीक्षित हूँ --बोलो

--------Divya Shukla-------

12-8-2013