Saturday, 17 August 2013

हर दीवार पे टंका एक ही चेहरा !




हर दीवार पे टंका एक ही चेहरा

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दीवार पर टंका वो चेहरा

पास आ जाता है सिमट के मेरे

अब मै तन्हा नहीं होती

उस चेहरे पर टंकी है सिर्फ

दो बड़ी बड़ी गहरी काली आँखे
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बोलती है मुझे पहचानो

अब तुम ही बताओ ?

तुम्हारी आँखों में ड़ूबने के बाद

अपनी ही सुध कहा रह गई

उफ़ वो तिलस्मी फिर से मुझे

बहला गया सिर्फ आँखों से

मुस्करा के एक सवाल छोड़ गया

कौन हूँ मै तुम्हारा अपना सा

जरा पहचानो तो मुझे --

एक हल्की सी मुस्कान तिर गई

मेरे होठों पे --सुनो जानती हूँ तुम्हे

मै तो बहला रही थी तुम्हे

तुम भले सामने न आओ

मै आँखे मूंद कर भी तुम्हे देख लेती हूँ

अब बोलो तो --वो आँखे मुस्करा दी

जरा देखो तो तुम्हे मेरी आँखों ने

सहेज़ लिया है ----पलकों में

उफ़ ये कौन किसकी आवाज़ है ये

ओह तो तुम हो हर दीवार पर टंके हुए

सुनो एक बात कहूँ --तुम्हे पता है ?

अच्छे हो तुम ------- 


अच्छा दिल की बात सुनो --

तुम्हारी निगाहों की हदबंदी में

बड़े महफूज़ से रहते है हम

--------Divya Shukla -------

१७ -८ -२०१३

तस्वीर गूगल से
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