Sunday, 18 August 2013

तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -? --




तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

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एक पहर बीत चला संवाद हो रहा था

परंतु मौन से मौन का --वो कदाचित

मेरे अंतर्मन में झाँकने का प्रयास कर रहा था

सुनो तुमने कभी देखा है सांभरी को वसंत जीते -?

घने जंगल में...नदी तट पर -----------

भूधरों की ढलान पर....अचानक वो पूछ बैठा

उत्तर की प्रतीक्षा में वह मेरा मुख देखता रहा

और मै न जाने कहाँ थी उसका प्रश्न मथ गया

मेरे मन मस्तिक्ष को उथलपुथल सी मच गई

मुंदी आँखों में बस दिख रही थी सांभरी की दो आँखे

वो आँखे मानो दर्पण में स्वयं को देख  रही थी --------

उत्तर दो न देखा कभी तुमने ? मेरा हाथ हिला कर वो बोला

चौंक उठी न जाने क्या सोचती रही अचानक ही बोल पड़ी

न नहीं देखा कभी --पर कल्पना की है घनघोर बन में भटकती

- कभी घात लगाये सिंह के पंजो की आहट से  सहमी

-तो कभी बन के भयानक कुत्तों के  विभत्स स्वर से

भौचक औचक सी सांभरी प्यास लगने पर भी

नदी के समीप जाने का साहस नहीं जुटा पाती

--घनी कटीली झाड़ियों से स्वयं को ढंक लेती

चुभते कांटो से धीमे धीमे बहता रक्त ---------

------------ और उस वेदना को  धीमे धीमे पीती

साँभरी के पीड़ा से रक्तिम नेत्रों को --------------

बस कल्पनाओं में ही देखा है ----बोलती जा रही थी मै

गोधूलि बेला अस्ताचल को जाते सूर्य --को देख रही थी

और वह लगातार कुछ बूझने का प्रयास कर रहा था

मौन पसरा रहा संध्या का धुधंलका फैलने लगा

परन्तु मौन का संवाद तो था --उत्तर प्रत्युत्तर भी

बिन बोले ही सुन लिया सब उसने-------------

------------- और फिर अत्यंत मध्यम स्वर में कहा

सांभरी की व्यथा स्पष्ट उभर आई है तुम्हारे मुख पर

मानो तुमने ही जिया हो -- मेरा एक आग्रह मानोगी ?

तुम्हे सांभरी कह सकता हूँ --जानती हो क्यों

तुम दोनों के नेत्रों में कितना साम्य है तुम्हे नहीं पता -

अरे न ना उत्तर दिया मैने -----आखिर क्यों नहीं कह सकता ?

सिंहनी हूँ --- सांभरी नहीं कह जोर से हंस पड़ी मै

अब कैसे कहूँ उसे -शायेद -वो नहीं समझ पायेगा

कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रहें तो अच्छा है -----

------------Divya Shukla---------------

(सांभरी --हिरणी )

18 -8-2013

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