Wednesday, 21 August 2013

कब तक लोगे सात फेरों के गुनाह का बदला ? ---

कब तक लोगे सात फेरों के  गुनाह का  बदला ? --
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मिस्र के पिरामिड में हीरे जवाहरात के बीच ममी सुरक्षित तो रहती है युगों तक 
.. पर खुश नहीं रहती --- खुश रहने के लिए एक पल काफी है .....प्रेम का पल .....वरना ईंट पत्थर के पिरामिड में ---- भटकती है एक जिन्दा रूह --- जो सोने और पीतल को मिला कर उनमे अंतर देखती कभी हीरे और कांच में अंतर खोजती फिर यह सोचती दोनों एक से ही हैं इनमे सुख कहाँ ---- झूठे बोलों में प्रेम का भ्रम पालती ---कभी नियति का खेल मान मन मार लेती ------अक्सर हवेली की तीसरी मंजिल पर शाम को ढलता सूरज देखती ---रात के सन्नाटे में अहीर टोले से गूंजते गीत सुनती जिन्हें वो लोग देसी महुआ के मद में मस्त हो छांग बजा कर गाते ----भोर के तारे से बतियाती फिर खीज उठती --उसे याद आता फिल्म का डायलाग --जेवर बनवाओ फिर जेवर तुडवाओ ---तुम औरतो को यही करना चाहिये -- खुश रहो इसी में सज कर इंतजार करो हमारा--कभी न पूछना कहाँ जा रहे हो कब वापस आओगे ----अचानक खुली आँखों से उसे लगता वह नायिका उसमे समाहित हो गई ---और फिर चीख निकल जाती उसकी -- --उफ़ अब हद हो गई बंद करो यह तमाशा -- साँसे जो गिरवी है न --अरे सांस तो लेने दो --दम घुटता है अब इस मकबरे में --मुक्त कर दो जाने दो मुझे .......कब तक आखिर कब तक ? लोगे मुझसे सात फेरों के गुनाह का बदला ---इसने तुम्हे तो आजादी दी कुछ भी करने की और मुझे बंदिनी बनाया 
बेगुनाह आजीवन कारावास ---
----------------Divya Shukla-------------------
कुछ लाइनें मेरे पन्नों की जो शायेद कभी हो सकता है 
किताब का स्वरूप ले ले ---
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22 -8-2013 
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