Monday, 5 August 2013

वो कौन सी डोर थी ---




वो कौन सी डोर थी ---

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मृगनैनी को यार नवल रसिया --आह

पंडित जी की सम्मोहती आवाज़ जिसे

आँख मूंद कर सुनना गजब की अनुभूति

एक अनिर्वाच्य आनंद --अद्भुत सुख

आज नींद न जाने कहाँ जा कर सो गई थी

-रात्री का तीसरा पहर बीत रहा था

दूज का चाँद इठला कर मुंह चिढ़ा रहा था

धीरे से अर्धनिंद्रा में डूबते उतराते हुई

न जाने कब कैसे मै वहां पहुँच गई जहाँ

जहाँ चारो ओर पहाड़ और दूर से उन पे जमी बर्फ

जो रात्री में सीप सी चमक रही थी

दूर तक मीलों फैली फूलों की घाटी

एक एक फूल को छूती मानो उनकी

सुगंध को आत्मसात करते हुए मैने

अपना पूरा आंचल फूलो से भर लिया

और चल पड़ी सम्मोहित सी पहाड़ी की ओर

न जाने कौन सी डोर खींचती जा रही थी

और मै धीरे धीरे चढ़ती जा रही थी ऊपर पहाड़ी पर

पहुँच ही गई सबसे ऊपर आखिरी पग रखा ही था

की अचानक फिसल गई तेज़ी से घाटी की ओर

लुढ़कती हुई पत्थरो से घिसटता बदन लहूलुहान हो रहा था

फिर भी मै आंचल के फूल सहेजे रही --ओह ये क्या

अचानक एक हाथ बढ़ा और झट खीच लिया मुझे समेट लिया उसने

और अपने वक्ष में छुपा लिया - शून्य सी न जाने कबतक

- तन्द्रा अवस्था में खड़ी रह गई पता भी न चला

अरे ये मै कहाँ हूँ ? तुम कौन हो ?

अरे मुझे नहीं जानती फिर क्यूँ खोजती हो

क्यों पुकारती हो कभी संगीत में तो कभी

इन फूलों की घाटियों में ---जोर से हंसा

वो अट्टहास मेरे रोम रोम में सिहरन सी दौड़ गई

मेरा आंचल खीच मुट्ठी भर फूल ले उड़ा दिए उसने हवा में

वह हँसता रहा और भर भर मुट्ठी उडाता रहा फूलों को

और मै सम्मोहित सी कभी खुशबू को सांसो में भरती

कभी उड़ते फूलो को निहारती जो घाटी में बरस रहे थे

पर उसका चेहरा क्यूँ नहीं नहीं दिख रहा था मुझे

हाथों के स्पर्श की अनुभूति उसकी साँसों की ऊष्मा

उसके बोल सब का अहसास था पर

उसे पहचान क्यूँ नहीं पा रही थी

कौन हो बोलो न -- सामने क्यों नहीं आते तुम

एक प्रश्न ? और उसका उत्तर क्या दिया पता है

नहीं पहचाना मै तुम में ही तो हूँ विलग कहा

और फिर मेरा हाथ थाम के बोला आओ देखो

उसने दो मुट्ठी फूल  ले आकाश में  उछाल दिए

झरने लगी राख निरंतर और नहा गए दो वजूद

चारों ओर बस सुगंध ही सुगंध फैल गई

तुम पूछ रही थी न कौन हूँ मै --

तो सुनो हम दोनों कौन हैं भूल गईं न तुम

आओ देखो और पहचानो खुद को और मुझे भी उसने कहा

और अपनी तर्जनी से इशारा किया देखो उधर

सुदूर छितिज़ की ओर --और वहां चली जा रही थी

दो  पारदर्शी आकृतियां ----

----------Divya Shukla-------------

5-8-2013

पेंटिग गूगल से अज्ञात कलाकार