Monday, 2 September 2013

आज मंदा उदास है न जाने क्यूँ ?



आज मंदा उदास है न जाने क्यूँ ?
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बहुत दिनों बाद आज फिर

मेरे कदम उठ गये तट की तरफ 


मेरी प्रिय शरणस्थली की ओर

अस्त होते चाँद की छाया

मन्दाकिनी के जल में हवा के

हल्के झोंके से ऐसे हिल रही है

मानो चाँद रह रह कर काँप उठता हो

चांदनी मुरझाई सी थी --उसके हाथ में

खत था पत्ते पर लिखा हुआ

और थरथरा रहे थे उसके हाथ --

पीड़ा उभर आई थी मुख पर

दर्द से वो पत्ता भी पीला पड़ गया था

शायेद दर्द से --हाँ दर्द ही से

जाने खत में क्या लिखा था

प्रश्नवाचक निगाहें उठी चांद की ओर

पर वो कहाँ था --वो तो जा चुका था

अस्त हो गया था ---और फिर उसके साथ ही

चांदनी का अस्तित्व भी विलीन हो गया

सारा दर्द मंदाकनी की लहरों को सौंप कर

जो सदियों से बह रही है सबका दर्द समेटे

बिना कुछ कहे बस मौन निशब्द निर्विकार --

सोचती हूँ कभी सखी मंदा के सब्र का बांध अगर टूट गया तो ?

क्या वह सागर तक पहुँचने की प्रतीक्षा कर पायेगी---शायेद नहीं

अभी तो वह मौन है उदास है ---बहती जा रही है कुछ सोचते हुए

शायेद यही कब तक समेटूं इन सबकी पीड़ा और क्यूँ ?

और मै निशब्द बैठी सुन रही थी मंदा की आत्मा की आवाज़

मौन से मौन का एक सशक्त संवाद चल रहा था हमारे बीच

वो सदियों से मै दशकों से एक सी ही तो हैं हम दोनों

ये भी एक साम्य है जो हमे खींचता है

और मै खिंची चली आती हूँ तट पर ----

आपस में बांटने पीड़ाओं को -नन्हे नन्हे सुख भी

पर इस बार बस संकेतों में कह गई वह सब

कुछ छुपा भी गई -- सुनो ! फिर आऊँगी तुमसे पूछने

अभी तुम्हारी हलचल मेरे मन में समां गई है

वही लेकर जा रही हूँ आज ---चलती हूँ

फिर आऊँगी ----मुझे तुम से बहुत कुछ कहना है

बहुत कुछ बांटना है ---एक दूसरे से

----------Divya Shukla--------------
2-9-2013

तस्वीर  गूगल से -