Friday, 13 September 2013

मुक्त कर दूंगी तुम्हें --

मुक्त कर दूंगी तुम्हें -
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न जाने क्यूँ फिसल

जाते हो तुम -----

मेरी मुट्ठी से अक्सर

कितनी भी कस कर

बाँधी हो मैने ----

पर निकल ही जाते हो

अपनी सुविधानुसार

आने जाने के लिए

क्या इसलिए कि

तुम एक पुरुष हो ?

और कोई भी परिधि

या लक्ष्मण रेखा नहीं है

तुम्हारे लिए --क्यूँ होगी

ये सब भी तो

तुमने ही बनाई हैं

सिर्फ हमारे लिए

बस इतना ध्यान रखना

फिसल कर गर्त में

न गिर जाना ---सुनो

अब नहीं निकलूंगी तुम्हे

और बंद मुट्ठी से

मुक्त कर दूंगी तुम्हे

हर  बंधन से  --और

दूर अपने अंतर्मन से

सदा के लिए ----

सुनो एक बात कहूँ ?

क्या तुम नहीं जानते

मुझे राधा से मान

और सीता से स्वाभिमान

आशीष में मिला है

------Divya Shukla--------
पेंटिग  गूगल से साभार

१३ -९-२०१३