Saturday, 14 September 2013

द्विरागमन (गौना) का संदूक !!






 द्विरागमन (गौना) का संदूक 
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आज बरसों से बंद पुराना संदूक दिख गया

पुराने कबाड़ वाले छोटे कमरे में

मन फिर उन्हीं गलियों में घूमने और

उन्ही बंद लम्हों को पलटने को
 
मुझे से बार बार कहने लगा --

वो सारी खट्टी मीठी यादें वो सारे पल

जिन्हें बंद कर दिया था ठूंस ठूंस कर इसी में --

फिर सामने आ गये बरसों बाद

पुराने कबाड़ में के बीच से छिटक कर

विवेकशून्य सी आगे बढ़ती गई

और भीतर से कमरे की कुण्डी लगा कर

बहुत देर एकटक तक देखती रही उसे

एक उधेड़बुन चल रही थी एक हलचल सी मच गई मस्तिष्क में

मन एक बार फिर से दोहराना चाह रहा था अतीत को

और विवेक उसे बार बार रोक रहा था ऐसा करने को --

मानो कोई कह रहा हो , मत खोलो दशकों से बंद द्वार के पट

स्मृतियों पर अतीत धूल को यूँ रहने दो बहुत पीड़ादायक होता है

पर जीत मन की हुई विवेक अक्सर हार ही जाता है

आगे बढ़ कर खींचा बहुत वजनी था वह और फिर

बरसों से जमी धूल को धीरे धीरे आचंल से ही झाड़ा

आखिर मायके का बक्सा था --मोह तो बना ही रहेगा

माँ ने दिया था द्विरागमन पर --और फिर एक दिन

सब कुछ इसी में ही बंद कर के ताला जड़ दिया था

आज फिर कांपते हाथो से खोला इसे झलक गई

कुछ साड़ियां रेशमी -जिनकी जरी अभी भी चमक रही है

विदा की रेशमी लाल साड़ी को उठा कर हाथ फेरने लगी

जरी का तार अचानक हाथ में चुभ गया और मन में भी

एक सिंदूर का बड़ा सा डिब्बा भी था उसकी चांदी अब काली पड़ गई है

जिसे थाम कर नए घर में प्रवेश किया था ---शगुन का सिन्हौरा

उसमे अभी भी वही पीला सिंदूर भरा है जिससे मांग भरी गई थी ---

अम्मा की चुनरी थी जो शायेद रस्म के अनुसार

पहली विदा पर मायके जाते समय मुझसे बदल ली थी उन्होंने

अम्मा --मेरी सासू माँ उन्हें मै अम्मा कहती थी

पीले रेशमी किनारे वाली चादर जब ओढाई उन्होंने

नहीं जानती थी वह अपना धैर्य इसमें लपेट कर

मुझे सौंप रही है ---- बहुत चाहती थी मुझे अम्मा

बिना संवाद किये भी हम दोनों में संवाद होता था

अम्मा मेरा चेहरा मेरी आँखे मेरा मन पढ़ लेती थी ---

पर अपने कोख जाये को वो नहीं सिखा पाई अपना ये गुण

और फिर मैने एक दिन सब कुछ समेट कर बंद कर दिया इस बक्से में

माफ करना अम्मा मुझे बहुत कठिन था मेरे लिए सब

मै अनजाने में बुदबुदा रही थी ओठों में ही

न जाने कब तक गुम रहती पुरानी यादों में कि अचानक

एक आहट से चौंक पड़ी शायेद किसी ने दरवाज़ा खटखटाया

------सारा सामान अचानक छूट गया हाथों से --

बिखर गया पीला सिंदूर छिटक कर फर्श पर -------

-----------सारी चूडियाँ छन्न से गिरी और टूट गई

हकबका कर हाथों से ही समेटने लगी मै

--------उफ़ -चुभ गई किरचें उन्हें बटोरने में

------ रिस आईं खून की बूंदे उंगलियों के पोरों पर

निकल आई दिवास्वप्न से बाहर ----------

और एक झटके में बंद कर दिया संदूक का ढक्कन

शायेद फिर कभी न खोलने के लिए ---पर अम्मा

मैने अपने आंसू तुम्हारी चादर में सहेज़ दिये है

आज सूरज पश्चिम से निकला है

झरोखे से सूरज की एक किरण झाँक रही है

मानो बार बार बुला रही हो आ जाओ इधर

अतीत के अंधेरो को दफना कर थाम लो रोशनी की डोर

आखिरकार उठ ही गये कदम रोशनी की ओर

एक नया सूरज एक नई भोर एक स्वतंत्र अस्तित्व

----------------Divya Shukla-------------------

१४ -९ -२०१३

तस्वीर गूगल से