Saturday, 28 September 2013

वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?


वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

-----------------------------------------------------

सुनो वो मै ही हूँ जो कभी सारी कायनात को ठोकर मार सकती थी

पर अब तुम नहीं जानते राख का एक ढेर सा बन गया है

मेरा अस्तित्व बस एक चिंगारी दबी है उसमे उसे वही दबा रहने दो

और ढंक दो वरना सब कुछ राख हो जाएगा ---तुम नहीं जानते

उस दिन जब मै शांत बैठी थी नदी के किनारे न जाने किस ध्यान में

नदी मुझे लहरों में समेट कर दूर तक ले गई देर तक लहरों के संग

बहती गई दूर तक न जाने कितनी दूर बहती ही जा रही थी और फिर

न जाने क्या हुआ अचानक न जाने कैसे मै ऊपर उठने लगी

मानो फूल सा हल्का हुआ मेरा अस्तित्व और मै आकाश में चल रही थी

घबरा कर नीचे देखा अरे वहाँ भी मै ही थी मै देख पा रही थी स्वयं को
,
नेत्र मूंदे हुए और मुख पर अनोखी शांति लहरों पर सोई हुई बह रही थी

आकाश में बादलों के बीच जो पंछी की भांति उडती फिर रही थी वो भी

मै थी

न जाने कब तक तैरती रही आकाश में बिन परों के फिर थक कर

नदी किनारे पेड़ के नीचे ही बैठ गई सफ़ेद फूलों से भरा अद्भुत पेड़

न जाने कैसी सुगंध थी जो मेरी चेतना पर हावी होती जा रही थी

मेरे भीतर समाती जा रही थी मेरे रोम रोम में बस रही थी -

और मेरी पलकें बोझिल होती जा रही थी मानो सुरापान किया हो

यह कैसी मदहोशी थी बार बार अर्धचेतना में भी कौंध रहा था विचार

अचानक न जाने किसने छुआ और मै लौट आई वापस वो दिखा नहीं

वो कौन था क्या दिखा रहा था ,अचानक सुनाई देने लगे कई मनुष्यों के

 स्वर

वो गूंज रहे थे शांत वातावरण में उच्चारित कर रहे थे लगातार बार बार

राम नाम सत्य है -सामने देखती हूँ तो एक के बाद एक कई शव

 निकलने लगे

मैने उन व्यक्तियों को पुकारा वो पलट मेरी तरफ मुड़े पर

उनका चेहरा नहीं दिख रहा था पर उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी मुझे

अरे तुम्ही को तो दिखाना था यह पहला शव है तुम्हारी आसक्ति का

दूसरा सांसारिक वासनाओं का ,तीसरा सच्चे निस्वार्थ प्रेम का ,चौथा

 तुम्हारी अपेक्षाओं का , बस करो अभी और भी हैं ? क्या मै पूछ बैठी ---
हाँ अभी प्रतिकार और घृणा भी आ रहें है ,नहीं तुम लोगों ने मुझसे

पूछा भी एक बार तो कहा होता अब इन चारों को तो ले ही जा रहे हो

ले जाओ पर वो दो तो अभी मेरे पास रहने दो यदि प्रतिकार और घृणा

 भी न रह गई तो जीवित रहने का क्या अर्थ , या तुम प्रेम को छोड़ जाते

 अब उसे ले गये तो इन्हें तो यही रहने दो मेरे पास यही तो मेरे राख हुए

 अस्तित्व को कुरेद कर

इसमें से वो चिंगारी खोज निकालेंगे जो कहीं दबी हुई है मुझमें ही

और फिर न जाने कैसी हवा चली लौट आई मै वापस न जाने कहाँ से

वो कौन थे वो क्या संकेत दे गये --अब तुम ही बताओ ?

-------------Divya Shukla------------------

29-9-2013

पेंटिग गूगल से