Tuesday, 1 October 2013

भटक रहीं है सतरूपा ,ईव और हव्वा की बेटियां




क्या स्त्री मात्र एक देह है ?

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स्त्री मात्र एक देह है ?

------या देह से इतर भी कुछ है

-इन्ही प्रश्नों में उलझी --------

------जीवन कंटीली पगडंडियों पर

भटकती हुई स्त्री यह अब भी नहीं जानती ----

-----जिस दिन से वह ठान ले

और अपना विस्तार करना चाहे तो

-----पूरी कायनात उसके लिए

बहुत छोटी पड़ जायेगी -----

------ जब घटने पे आयेगी

तो मुट्ठी भर राख में तब्दील हो जायेगी

--------वह निरंतर आगे बढती रहती है

अपने पीछे छोडती हुई -----

-----पथरीली राहों के नुकीले पत्थरों से

घायल रक्त से सने ---------

----युगों तक न मिटने वाले अपने पग चिन्ह

--------नारी जीवन का यथार्थ बड़ा कटु है

उसके जीवन की पीड़ा सिर्फ उसकी ---

--------परन्तु उसके सुख सब के लिये

लोग चाहे कुछ भी कहें पर कुछ नहीं बदला

स्त्री चाहे गांव कस्बे की हो अथवा महानगर की

एक जगह आकर सब एक सी ही हैं

अपने सुख अपने लिए सोचा मात्र भी उन्होंने -----

प्रतिबन्ध और वर्जनाओं की एक मजबूत दीवार

आज भी खड़ी कर दी जाती है उसके चारों ओर ------

विडम्बना तो यही है यह सारे नियम वो निर्धारित करते है

जिनके मुख पर न जाने कितने मुखौटे होते है

प्रयत्क्ष रूप से जो प्रतिबन्ध का समर्थन करते है मुखौटा ओढ़ कर

वो ही परोक्ष में इसे तोड़ते भी है अपने असली स्वरूप में

कितना दोगला स्वरूप है इस समाज का और इनके रिश्तों का

दिन के उजालों में जहां रिश्तो और कर्तव्यों के

बड़े बड़े भारी भरकम पाठ पढाये जाते है

-- हरे ,पीले ,सफेद वस्त्रों की आड़ में धर्म भीरुता का

घुट्टी कर्तव्य के रूप में मन मस्तिक्ष्य में कूट कूट के

भर दी जाती है ----कर्तव्य बोध की लम्बी चौड़ी दास्तान

उदाहरण सहित सुनाई जाती है ---दूसरी तरफ वहीँ

-रात के अंधेरों में रिश्ते लुटते है शर्मसार होते है

कर्तव्य बोध कहीं विलुप्त हो जाते है पाप हावी हो जाता है

रात की काली चादर में --झक सफ़ेद वस्त्र दागदार होते हैं

धर्म चीखता है और उसके ठेकेदार अट्टहास करते हैं

--रिश्ते शर्मसार होते हैं ----कितनी विडंबना है --

किन्तु विरोध के स्वर यदाकदा ही मुखरित कर होते है

और फिर तीर की तरह चुभती पैनी निगाहें

व्यंग के वार से छलनी अंतरात्मा लिए एक स्त्री ही

भटकती फिरतीं है जीवन की पगडंडियों पे -

यही एक प्रश्न लिए अपनी पनीली आँखों में

तुम ही बताओ समाज के ठेकेदारों उत्तर दो

क्या स्त्री सिर्फ एक देह है बोलो ?

या इससे इतर भी कुछ है उसका अस्तित्व ?

इस यक्ष प्रश्न का उत्तर कौन देगा

मनु की सतरूपा /आदम की हव्वा /एडम की ईव

ये सब भटक रहीं है ओढ़े हुये

इन सफ़ेद ,पीले ,हरे रंगों के कफन

और जवाब मांग रहीं हैं समाज और

रंगो के इन ठेकेदारों से --

क्या स्त्री देह के इतर कुछ भी नहीं ?

-----Divya Shukla--------

2-10-2013

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