Thursday, 10 October 2013

बुत जो मोम रहा न पत्थर !

बुत जो मोम रहा न पत्थर 


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सुनो ! मेरे सवालों का जवाब दो न

जिंदगी अक्सर यही कहती

और मै जान कर अनजान बन जाती

तुझे नहीं पता सारे सवालों के जवाब

न जाने किन किन अँधेरी गलियों से

गुजरते है और फिर आ के

अटक जाते है हलक में सारे शब्द

वो अक्सर बाहर नहीं आते ----और फिर

यही सजा बन जाती है उन जुर्मो की

जो कभी किये ही नहीं -- फिर बेइंतिहा घुटन

ओह अचानक Cell Phone बज उठा ---

चौंक पड़ीऔर फिसल गया हाथ से

क्रिस्टल का वो खूबसूरत कीमती शोपीस

उसके टूटने की आवाज़ --और लगा

मेरा पूरा वजूद इसी तरह बिखर रहा है

पता है क्रिस्टल क्यों प्रिय है

कुछ कुछ खुद को कम्पेयर करती हूँ न

पारदर्शी कांच ही तो है मन की ही तरह

कभी मेरा Passion रहा ये क्रिस्टल आज भी

बिखरे टूटे मन को सुकून देता है

खुद को तलाशा तो हर कट में

एक साथ कई चेहरे झलकते हैं

खुद से सवाल जवाब करते हुये

मेरे भीतर चलते हुये झंझावात को

कभी उलझाते कभी दंश देते

अपने पैने नखों से उन जख्मों की

सूखी परतें उधेड़ते जिन्हें दफना दिया था

बरसों पहले पुराने विस्मृतियों के कब्रिस्तान में

आज फिर छन्न से टूटा कांच का बुत

दौड़ गई दर्द की लहर नसों में

कभी हर्दय की पीड़ा तो कभी टूटे हुए

टुकड़ों को बटोरने में लहूलुहान हुई

उँगलियों से रिसते रक्त की मीठी पीड़ा

और उस पीड़ा को घूंट घूंट पीती जिंदगी

गुज़र रही थी एक नक़ाब ओढ़े हुये

कुछ सफर ऐसे भी होते है जो खूबसूरत है

पर उनकी कोई राह उस गली से नहीं जाती

जहाँ एक पूरा वजूद अपनी ही चुनी हुई

तनहाइयों में भटकता है--अभिशप्त आत्मा सा

खुद से सवाल करता --जवाब भी खुद ही देता

पता ही न चला कब धीमे धीमे

उम्र की दहलीज़ें फलांगती गई -पर

आज भी खुद को उसी जगह पाया

जहाँ से मोम का वजूद पत्थर में

बदलने लगा -उफ़ न पत्थर हुआ

न ही मोम रह गया -----

और जिंदगी वो तो गुजरती रही

ख्वाबों में जीते हुए -----

भला ख्वाब भी किसी के हुए है

हकीकत और सपनो की दुरी का

अहसास होते ही --छन्न से टूटता है कुछ

जिंदगी घुटने लगती है और फिर

अपनी ही हंसी खोखली लगती है

लगता है साँसे तो चल रही हैं

पर पूरा वजूद मुर्दा हो गया

आँखे मूंद कर ऊँची इमारत से

छलांग लगाने की कल्पना भी

एक सुखद सा अहसास देती है हवा में तैरने का

ओह कहाँ खो गई थी क्या सोच रही थी

अचानक Maide ने Door knock किया

दीदी Green Tea लीजिए आपको कहीं जाना भी है

नही अब आज और कहीं नहीं जाना मुझे

देर हो गई बहुत अब बस वही जा कर आती हूँ

और ड्राइवर से गाडी बुकशाप की ओर

मोड़ने को बोल आँखे मूंद ली ---

----------Divya Shukla------------

11-10-2013

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