Saturday, 12 October 2013

ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे !!







ये सांकले नियति है जो टूट कर भी जकड़े है उसे
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सुनो --तुम कह तो रहे हो परंतु पाँव में बंधी सांकल कैसे तोड़ दूँ
हाँ वो मै ही हूँ जो इस कायनात को ठोकर मार सकती थी कभी
फिर क्यूँ कमजोर पड़ रही हूँ सोचती हूँ फूलों में गुजरने का समय तो 
कांटो को चुनने में गुजर गया या सोच लो हमने ही स्वयं गुज़ार दिया
तुम नहीं जानते उन कांटो की पीड़ा बहुत कम थी इन जहरीले फूलों के दंश से तो बहुत ही कम तुम जानते हो वो लोहे की मजबूत सांकल जो कैदीयों के पांव में बांधते है उन्हें क्या कहते है वो बेडियाँ कहलाती है न ? ऐसी ही एक बेड़ी कब की तोड़ डाली मैने
-कब तक भागती कहाँ तक भागती --उससे वो व्याघ्र था -एक चतुर व्याघ्र
उस सुनहरी गुफा के हर कोने में खोजती उसकी दो पैनी निगाहें हर समय इर्दगिर्द होती
मानो शरीर से हड्डियों तक आरपार देख रही हो मौका मिलते ही दबोच लेते दो भयानक पंजे जिनके नख बहुत पैने थे --जबड़े बहुत भयानक ऐसे की समूची हड्डियों तक को निगल जायें ---परंतु हिरणी निकल गई उस के पंजे से सुरक्षित
आत्मा में धधक रही प्रतिशोध की अग्नि लिए परंतु आहत मन पर खरोंचे भी थी
--सोने की उस लंका को दुत्कार गहबर बन में भटकने अपने छौनो के साथ सारे साम्राज्य पर निर्द्वंद राज्य करने वाला व्याघ्र तिलमिला कर रह गया
वह नहीं भूला अपनी हार -----हाथ आई उसके केवल टूटी हुई कड़ियाँ
उसे ढूंढता है मन में लिए प्रतिकार एवं अवसर मिलते ही करता है आघात बार बार
सांकले तोड़ दी मैने ---टूटी सांकलों की कड़ियाँ सहेज़ रखी है उसने ---
अब थक गई हूँ बंद लिया स्वयं को गुफा में --रोशनी एक किरण बस बहुत है मेरे लिए
परंतु मै हारी नहीं हारूंगी भी नहीं --लंका ध्वस्त करने का हौसला जुटाती हूँ अब भी
मै सीता नहीं पर पथभ्रष्ट भी नहीं वो राम नहीं पर रावण के साथ था फिर कोई और उपाय भी नहीं था लंका त्यागने के सिवा ----अतीत चुभता है वर्तमान मुंह चिढाता है -- हाथ खाली हैं ममता संबल है परंतु नन्हे छौने अब स्वालम्बी हैं बन में अपना रास्ता स्वयं बना लेंगे -- मोह धीरे धीरे खतम हो रहा परंतु सत्य यही है वैराग्य नहीं मन में क्रोधाग्नि धधक उठती है प्रतिकार की --एक छण को घृणा होती है विश्वास नहीं होता अब कहीं किसी पर -----एक पल कोमल भाव उठे नहीं कि व्याघ्र के तीक्ष्ण नख न जाने कहाँ से सामने आ जाते और दूर छितिज में टंकी दो आँखे दिखती जो सब देख कर भी मुंद जाती थी शायेद धन का पलड़ा भारी था उन पर अग्नि के समक्ष लिए वचन स्वर्ण की सुनहरी आभा के आगे बिसर गये --- घिन आती है उन पर ही अपराधी वही है --सत्य यही है रक्षा का वचन लेने वाला ही अपराधी होता है न अगर वह अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए वह भी लोभ में --सांकले तो अब भी हैं पर --शायेद नियति में यही लिखा है --आखिर रक्त पिपासु व्याघ्र से कहाँ तक लड़ पायेगी हिरणी --समाज भी तो समर्थ के होता साथ है सत्य के साथ तो अधिकांशतः अपने भी नहीं होते !!
------------------------Divya Shukla-------------------------
कुछ कहा कुछ सुना --इर्दगिर्द से

12-10-2013

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