Thursday, 17 October 2013

जब अंतिम विदा दी थी मैने !!


जब अंतिम विदा दी थी मैने

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मैने यादों की पोटली फेंक दी है

नहीं सहेजना इन्हें --अब बहुत हो गया

इसमें समेट कर बाँध दिया था

तुम्हारा विश्वासघात उफ़ वही तो अब

सबसे ज्यादा गंध मार रहा था

उसकी अप्रिय गंध  से जीना दूभर हो गया था

मेरे प्रतिकार करने पर त्रियक होठों से

ह्रदय को भेदती तुम्हारी मुस्कान

नहीं भूलती उस दंश की पीड़ा

तुम नहीं जानते कितना कुछ

खो दिया था उस पल तुमने

कल तुम जब मेरे समीप बैठ

प्रयास कर रहे थे बार बार

टूटे तारों को जोड़ने का और

न जाने कितने उदाहरण दिये थे

शाश्वत होते हैं सात जन्मो के रिश्ते

और यह भी कहा मुझसे

जल को कितना भी छुरी से काटो

वो कहाँ बट पाता है दो भागों में

पर तुम क्यों भूल जाते हो यह बात

प्रेम के धागे को तोड़ कर भला

कोई जोड़ पाया है कभी गाँठ पड़ जाती है न ?

तुम नहीं जानते मैने कितने मान और अधिकार से

तुम्हारे वक्ष पर अपना सिर रख कर सुनना चाहा था

अपना नाम तुम्हारे ह्रदय की धडकनों में

परंतु वहाँ मै नहीं कोई और था --सुनो और तब

मैने कहा था न तुम जा तो रहे हो ----

पर मै तुम्हें आवाज़ नहीं दूंगी न अभी न फिर कभी

पीछे से आवाज़ देना मेरी आदत नहीं जानते ही हो तुम

तब हंस दिये थे न तुम और मै नम आँखों से देखती रही

तुम्हें जाते हुये तभी अपने रिश्तों को अंतिम विदा दी थी मैने

मुझे पता था मैने कहा भी था तुमसे तुम आओगे वापस

पर उस दिन तुम याचक होगे ---और मै

मेरे पास कुछ नहीं होगा तुम्हें देने को

अब कुछ नहीं बचा कुछ नहीं बाकी

सुनो !अब मै कह रही हूँ तुम जाओ

मरे हुये रिश्तों के शव यहाँ नहीं रखे जाते

--------------------दिव्या -----------------

17-10-2013

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