Wednesday, 23 October 2013

सुनो ! तुम नहीं जानते




तुम नहीं जानते ?
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आज न जाने क्यूँ

तुम बहुत याद आ रहे हो

तुम्हारे पास बैठ बस

तुम्हे निहारते रहने को

दिल कर रहा है

बिना बोले न जाने

कितनी बातें करनी हैं

तुम्हारी प्रतीक्षा में -

मेरी निगाहें रह रह के

दरवाज़े पे टहल आती हैं

हवा से भी जब सांकल बज उठती

तो बार बार तुम्हारे ही आने का

भरम होता है ---पता नहीं क्यूँ

तुम्हे भी मेरी याद आ रही है न ?

तुम नहीं हो -यहाँ -जानती हूँ

जानते हो तुमसे ज्यादा

तुम्हारे होने का अहसास

प्रिय है मुझे --हैं न अजीब सी बात

देखो फिर न कहना कभी

कहा नहीं मैने ---मै कहाँ कह पाती हूँ

अब कल की ही तो बात है

जब तुमने कहा था ---

तुम्हे इश्क है मुझसे -


पता है तुम्हे -----

इक जलतरंग सी बज उठी थी

कानों में सुन कर ---

कान की लवें गर्म हो गई

पलकें अकेले में भी झुक गई थी

फिर यही सवाल मुझसे भी पुछा तुमनें

नहीं बोल पाई कुछ ---

जब की फोन पर थी --

तुम सामने भी नहीं थे --

अगर झूठ कहना होता तो

तो कह ही देती ---पर सच बोलना

बहुत मुश्किल है न  ---लो सुनो न

हाँ मुझे भी इश्क है तुम से

कितना मुश्किल है ये कहना उफ़

बिना कहे क्या नहीं समझ सके तुम

कितने खराब हो तुम --हटो जाओ भी

------Divya Shukla----------

23-10-2013

पेंटिंग गूगल से साभार