Thursday, 3 October 2013

सुनो जिंदगी ---



सुनो जिंदगी ---

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जिंदगी सुन रही हो न ?

कितनी जिद्दी हो तुम

जरा मेरी बात भी सुना करो

कभी खुद से बाहर भी रहा करो
 
जरा झाँक कर देखो तो सही

आसमान में बादलों का लिहाफ है

ओढ़ कर उसे कुछ ख्वाब बुनो

धूप में चांदनी जलती है देखो

कतरा कतरा धूप भी पिघलती है

सूरज की आँखों में भी नमी झलकती है

चाँद की तपिश से कभी रात जलती है

पर जिंदगी मै तुम्हें खोजती फिरती हूँ

देखो कोई आवाज़ देता है मुझे बहुत दूर से

जिंदगी तुम कहना उससे जरा देर वो थम जाए

ऐसा न हो कि ये पत्थर ही दरक जाए ---

सदियों से जमी बर्फ पहरों में नहीं पिघलती

पूछना उससे क्या लगती हूँ मै उसकी

मै उसकी कोई नहीं फिर भी कुछ तो है

हम दोनों में जो खीच लाता है न जाने क्यूँ

कुछ सवाल इधर से कुछ जवाब उधर से

तुम जाओ तो सही जिंदगी वरना शाम हो जायेगी

अपनी शाम के सूरज को तुम ढलने ना देना

घूंट घूंट पीना पिघलती धूप को

कभी फूंक मार कर जलती चांदनी को

बहुत खूबसूरत हो जाओगी तुम ओ जिंदगी

फिर आ कर मिलना मुझसे

यही इसी जगह इंतज़ार करुँगी तुम्हारा

ओ जिंदगी जाओ --जी लो अब हर पल को

-------Divya Shukla-----------

3-10-2013

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