Tuesday, 8 October 2013

सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना




सूखे पत्ते --और तुम्हारा जाना

-------------------------------------

बालकनी में खड़ी मै देख रही हूँ

उन सूखे पत्तों को जो बिछ गए हैं

मेरे गेट के सामने वाली सडक पर

-जो पूरी तरह से ढंक गई है ---

पीले भूरे चितकबरे पत्तों से ---

ईवनिंग वाक का वक्त हो गया

मै उतर आई नीचे चप्पलों में ही

न जाने किस सोच में गुम थी

मैने sneakers भी नहीं डाले पांव में

और चल दी इस सुनसान सडक पर यहाँ

लोगों की आवाजाही कम ही है ---लिंक रोड है न

तभी पत्ते भी बिछे रहते हैं करीने से

धीमे धीमे चलते हुए कोशिश कर रही हूँ

पत्तो की आवाज़ में कुछ सुनने की

जब तुम जा रहे थे इसी सडक से

तेज़ी से गुस्से में जाते हुए तुम्हारे जूतों की

खटखट आवाज़ और पत्तों चरमराहट

दोनों एक दुसरे में मिल गई थी --

तुमने तब पेड़ों की तरफ नहीं देखा था

वहां तब भी नई कोपलें फूट आई थी

आज भी वैसी ही हैं --सूखे पत्ते भी नीचे बिछे है

मै रोड इस छोर पर खड़ी बस यही सोच रही हूँ

काश उस छोर से तुम अचानक आ जाओ

मुझे तुम्हारे क़दमों और सूखे पत्तों की आवाज़

मिलीजुली आवाज़ का इंतजार है --

बस कब तुम्हारा गुस्सा खतम हो

और तुम अचानक बेल बजाओ ---

पर देखना ज्यादा देर मत करना --

ध्यान रखना कहीं देर न हो जाए

आखिर हर बात की एक हद होती है

-ठीक वैसे ही जैसे पतझर का भी

एक मौसम होता है बस चंद दिनों का --

-------Divya Shukla-----------