Thursday, 28 November 2013

छाप की पाँवों की धूमिल सी

छाप की पाँवों की धूमिल सी
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पत्थरों के इस महल में

कुछ आलता रंगे क़दमों

के धूमिल से निशान दिखे

बरसो पहले नवाँकुरित सपनों को

आँचल में सहेजे गृह प्रवेश करती

किशोरी नवबधू के भीतर आते

पाँवों की छाप थी धूमिल भी थी

और चटक भी लगती कभी

अरे बस एक हाथ की दूरी पर

बाहर की ओर जाते क़दमों के

निशान सुर्ख़ लाल चटक से

किसके है ? ध्यान से देखो

पत्थर की गूँगी बहरी

दीवारों की दरारों में

अपनी उम्र के सारे बसंत भर

पतझर लिये इस ऊँची ड्योढ़ी

को लाँघ कर बाहर जाती हुई

उसी किशोरी के तलवों से

रिसते हु़ये रक्त की छाप है

---- Divya Shukla-----

26.11.2013

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