Friday, 8 November 2013

बर्फ के फूल !!




बर्फ के फूल
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जिस्म से लिपटती हुई गहरी स्लेटी शाम

मेरे माथे की सुर्ख लाल बिंदी सा सूरज

पेड़ की सबसे ऊँची फुनगी पर लटका

विदा कह ओट में छुपता जा रहा था

जाते हुये सूरज से चुराई एक किरन

धागे की तरह लपेट लिया उसे अपनी तर्जनी में

रात के सारे काले डोरों से मैने ढेर सारे गोले बना लिए

दिन रात के करघे में बुनती रही अपना दुशाला

पलछिन बीतते गये तमाम उम्र गुज़र गई -

आखिर आज ओढ़ ही ली रात की काली सियाह चादर

और ऊँगली में अभी लिपटी है किरन सूरज से चुराई हुई

उसे लगा ही नहीं पाई कहीं नहीं टांका बस लिपटी रही तर्जनी में

आईने में खुद को देखा वक्त ने टांक दी है चंद लकीरें

तुम ने तो बहुत कोशिश की वक्त की सलवटों को

अपने गर्म हथेलियों से समेटने की पर कहाँ हटा पाए

पता है तुम्हारी हर छुअन से टंक गये कुछ फूल

रात की चादर पर ---जो सुबह बर्फ के फूलों जैसे थे

मेरे सर्द वजूद से लिपटी यह चादर भी जम गई है

और उस पर टंक गये है कुछ सफ़ेद सुंदर पारदर्शी फूल

सुनो --मैने उस पर एक अंजुरी सुर्ख लाल आलता भी छिड़का था

भला काली रात पर भी कोई रंग चढता है नहीं न ?

तुम तो जानते ही हो न ----

सुबह यह बर्फ के फूल महक रहे थे भीनी भीनी सुगंध फैली थी

उफ़ क्या तुम नहीं जानते यह कितना भी महकें पर

रहेंगे बर्फ के ही फूल न ----

-------Divya Shukla--------

9-11-2013

पेंटिग गूगल से साभार