Wednesday, 4 December 2013

कुछ यूँ मिली दोपहर और सांझ

कुछ यूँ मिली दोपहर और सांझ 
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उस दिन किसी का घर खोजते हुये
अचानक तुम्हें देखा -ठिठक कर देखती रही
चश्मे के मोटे लेंस के पीछे से मिचिमिचा कर 
देखने का प्रयास करती तुम्हारी आँखे

साफ़ नहीं देख पा रही थी -नज़र कमजोर

शायेद ऐनक का नंबर बढ़ गया है --

तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों के साथ

पर आँखों की चमक बनी है

बिन दाँतों के पोपले मुंह की शिशुवत मुस्कान

जाड़ों की गुनगुनी धूप सी लग रही थी

बिटिया बैठ जाओ थक गई हो न

तुमने कहा और टूटा स्टूल बढा दिया

तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों को गिनने की चाह ने

और तुमसे बात करने की ललक ने रोक लिया मुझे

तुम से बात करते सुख दुःख सुनते

अनजान मोहल्ले की वो जाड़े की दोपहर

न जाने कब शाम में बदल गई पता ही न चला

ये अनजान बूढी अम्मा आज इस उमर में भी

अपनी रोटी खुद जुटाती है भोर होने से शाम तक

माचिस .बिस्किट रंगीन मीठी गोलियाँ और भी

छोटी मोटी चीजे ले कर अपनी खोखेनुमा दूकान में

रोज सुबह से धुंधलके तक बैठी रहती है --

मैने कहा अम्मा तुम क्यों बैठती हो इतनी देर

थक जाती होगी ? घर पर रहो आराम करो

नाही बिटिया काम करय से हाथ पैर चलत है

अउर आपन दुई रोटी क जुगाड़ होई जात है

जब तक जांगर चले केहू कय मुंह काहे देखी

अम्मा की आँखों वो चमक अपने साथ ले आई

वह स्वाभिमान की किरण कौंधी थी झुर्रियो में

उस दिन उस शहर के कोने की उस झुग्गी बस्ती में

अम्मा के साथ  वो दिन कब बीत गया पता ही न चला

मै और वो बूढी अम्मा ऐसे बतियाए ऐसे मिले --

मानो दोपहर और सांझ एक दूसरे से मिली हों

अम्मा तुम्हारी एक तस्वीर खींच लूँ कहा मैने

वो पोपले मुंह से हंस दी --का करोगी ई बुढिया की फोटू

तुम नहीं जानती तुम दुनिया की

सबसे सुंदर सरल स्वाभिमानी स्त्री हो

मन ही मन बुदबुदाई मै --और विदा ली अम्मा से

कंपकपाते झुर्रियों भरे कुछ खुरदुरे स्नेहिल हाथों का

स्पर्श संजोये वापस चल दी --पीछे से एक आवाज़ आई

फिर आना बिटिया --सच अम्मा

तुम संसार सबसे सुंदर स्त्री हो --

----------Divya Shukla---------

4-12-2013