Tuesday, 24 December 2013

समंदर सी गहरी आँखे और धूप सी हंसी

समंदर सी गहरी आँखे और धूप सी हंसी

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सुनो ! ठंड शुरू हो गई न ? अब धूप भाने लगी है

अखबार से नज़र हटा के ऐनक के पीछे से घूर कर देखा

और फिर पढ़ने लगे -- सुनो चलो कहीं दूर चले

थक गई मै अब --चलो न

बरसों से यूँ लावारिस पड़े हैं जो

वो अधूरे सपने बुनने है हमें -

कुछ तुम्हारी खुली आँखो में आज भी दीखते हैं

जब कभी तुम एकांत में सुदूर छितिज में ताकते हो

कुछ वह भी जो मेरी उनीदीं बोझिल पलकों से झरते हैं

रोज ही भोर में ये उन ख्यालों के सुनहरे रेशमी टुकड़े हैं

जो तुम्हारे लिए कभी संजोये थे पर अधूरे रहे

अब तो इन सुनहरे रेशमी टुकड़ों से बंट कर

ख्वाबों और ख्यालों की गुनगुनी चादर

बुननी ही है न चलो अब पूरी कर लें फिर से जी लें

कुछ अपने पल नितांत अपने निजपल

वो बची खुची जरुरी बातें जो हम कह न पाए

कुछ तो तुम ने भी मन में दबा कर रखा ही होगा

देखो अब कह सुन ले जी लें अहसासों को

ओढ़ ही अपने अधूरे सपनों का दुशाला

जिंदगी के सब काम तो लगभग निभा दिए

पर इन्हें निभाते हुए भूल गए हम खुद को

सर्द हो कर जम गये वो सारे जज्बात

पथरीली हो गई भावना जो दूब सी उगी ही थी

जिनमे कभी उग रहे थे नरम मुलायम सपने

खिलखिलाती धूप सी हंसी वाली किशोरी लड़की थी

बड़ी बड़ी काली समन्दर सी गहरी आँखों वाला

सांवला सा लड़का -जो बस देखता रहता एकटक उसे

और वह बोलती जाती बोलती जाती -अचानक

वो मुस्करा कर कहता - कितना बोलती हो तुम

बस हो गया अब कभी नहीं बोलूंगी तुमसे

वह तुनक जाती और मुंह फुला कर बैठ जाती

अरे सुनो मै छूना चाहता हूँ तेरी धूप सी हंसी को

उफ़ हे भगवान और खिलखिला कर हंस देती

अरे मैने तो सुनहरी धूप मांगी और तुने तो

चारों तरफ सितारे बिखेर दिये --अब क्या करूँ

बोलो कैसे समेटूं इन्हें --मै क्या जानू तुम जानो

कह वो भाग जाती -- उन गहरी काली आँखों को

अपनी आँखों में छुपा कर --और वह बस मुस्कुरा देता

आज फिर न जाने क्यों वो दोनों याद आये

अब तो हंसी की सुनहरी धूप उसे चुभने लगी थी -

उसकी काली गहरी आँखे बात बेबात घूरने लगी थी

न जाने क्यूँ समय की आपाधापी में नरमी कहीं खो गई

रह गया खुरदुरा वक्त --पथरीली राहे पार हो गई

माना जीवन जीना सहल नहीं --पर अब हो गया न

टुकड़ों में बचे पल सहेज ले --पर एक बात कहूँ

तुम्हारी काली गहरी आँखे ऐनक के पीछे से

और भी बड़ी लगने लगी है -ऐ सुनो अब घूरो मत

और खिलखिला कर हंस दी --पल भर को सब भूल गए

सुनो तुम अभी हंसी न तो लगा मै बरसोँ पीछे चला गया

सुनो आज की धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी है न --

तुम्हारी भी मुस्कान जो मिल गई इसमें मैने कहा

ऐनक खिसका कर कैसे देखा तुमने उफ़ हद हो गई

तुम भी न --कब बड़े होगे अब तो बच्चे भी बड़े हो गए

सुनो ऐसे मत देखो तुम मुझे ----

और एक जोरदार ठहाका गूंजा क्यूँ क्या हुआ

मै तो देखूंगा-कोई चोरी थोड़ी है -अब लो फिर नाराज़ हो गई

सुन ऐ मेरी जोहराजबीं तू अभी तक हसीन -और मै जवान

तुझ पे कुर्बान मेरी जान मेरी जान -

अरे अरे क्या कर रहे हो -चुप भी रहो अब

उफ़ कुछ तो शर्म करो -- 

देखो न सब देख कर मुस्करा रहे है --

और फिर न जाने कब तक

वो बड़ी बड़ी गहरी काली आँखें

उस धूप सी हंसी को पीती रहीं

दोनों को पता ही न चला --

कुछ पल फिर से जीवंत हो गए

--------Divya Shukla ------------

24-12-2013

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