Wednesday, 27 February 2013

सुनो तुम आये थे न ----


सुनो ! तुम आये थे न ?
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सुनो ! एक बात बताओ
तुम आये थे न ?
आज सुबह से ही
घर में बसी हुई है
परिचित सी महक
आंगन में एक जोड़ी
पैरों के निशान
फिर देखा बेड की
साइड टेबल पर
अधखुली किताब
बगल के तकिये पे
एक बाल था और
बस गई थी जाने पहचाने
शैम्पू की खुशबू अरे -----
-बदला नहीं अभी तक
तुम ने मेरी पसंद का शैम्पू
फिर भी लगा वहम है मेरा
ओह मेरे दाहिने हाथ की कलाई पे
कैसे उपट आये है ये निशान
तुम्हारी तीन उँगलियों के ---
तुम आये थे न ----
-मुझे पता है ----
ये तुम्हारे वजूद की ही खुशबू है
ये मेरा वहम नहीं है
-------------दिव्या ---------------------


14-9-2012

पेंटिग  गूगल  से  साभार 

Sunday, 24 February 2013

सपनों को खुला छोड़ दो -- :)

सपनों को खुला छोड़ दो -- :)
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आँख खुलते ही आज मूड खराब था
रात भर सपने बड़े अजीब से आये
न जाने कहाँ कहाँ भटकती रही
सारी रात सपने में उलझती सुलझती
अनजाने शहर में अनजाने लोगों के बीच
पर्स खाली क्रेडिट /डेबिट कार्ड दोनों ही नहीं थे
चंद दस के नोट और रेजगारी इससे फ्लाईट तो दूर
कोई बैलगाड़ी में भी न बिठाए --कितनी उलझन रही
नहीं कह सकती कितनी भारी गुजरी रात --
डरी सहमी जैसे न जाने कहाँ गुम हो गई थी मै उफ़ --
सुबह उठते ही सर भारी --मूड इतना ऑफ था कि
बेड टी लाने वाले ने भी तगड़ी झाड़ खाई --
फिर अफ़सोस हुआ ये बिचारा क्या करे -----
जल्दी से एक Parafizz ---पानी में घोल के पी ली --
चाय तो बस युही उड़ेल ली हलक में
छोटी सी  एक नींद और  कुछ देर की बस --
फिर  उठ कर काफी बेहतर लगा --झट से ब्लैंकेट फेका
सोचा आज गाने सुनते है --ब्रेकफास्ट गया भाड़ में
लाईट म्युज़िक अपनी पसंद के O.P.Nayyar -- आशा -रफ़ी के गाने
मन के तार झनझनाने वाले गीत
बजते ही मन के साथ मै भी झूमती हूँ न
सोचा डस्टिंग भी कर डालूं --- तुम्हे तो पता है
जब मै बहुत खुश होती हूँ तो सफाई करती हूँ
वो कबर्ड की हो या जिंदगी में जमी धूल की
मै गाने की रिदम पे कभी डस्टर मारती
कभी सब छोड़ कर डांस करती कदम थिरकते
फुल मस्ती --धूल जो हटानी थी ----सब ओर से
एक परत सी जम गई थी चारो ओर कुछ नहीं दीखता था
----और पता है गाने के बोल कौन से ---
-- आसमा के नीचे हम आज अपने पीछे
प्यार का जहाँ बसा के चले / कदम के निशां
बना  के चले / धूल तो झड़ गई पर
अपने निशान छोड़ गई ---उफ़
क्या ये हल्के होंगे कभी सोचने लगी मै
तभी एक हाथ बढ़ा और मेरा हाथ पकड के अपनी ओर
खींचा बोला सुनो उठो चलो पलट के देखना
अच्छी बात नहीं --सपनों को खुला छोड़ दो
अगर तुम्हारा है तो कहीं नहीं जाएगा
वरना किसी और आँख में बस जाएगा
मै हूँ न तुम्हारा दोस्त ---पक्का वाला
और वो बदमाश मेरी आँखों में झांक के बोला
आप से भी खूबसूरत आपके अंदाज़ है -- :))
मेरी आँखे नम थी पर होठ मुस्करा दिए
------------------------दिव्या -----------------
24-2-2013
Time --- 6.30 -pm
 —

Saturday, 23 February 2013

अभी कुछ बाकी है - - - - -


अभी कुछ बाकी है
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सब समाप्त होने के बाद भी
अभी कुछ बाकी है --------
इक हिकारत भरी नजर
डालनी है ----
--तुम्हारे क्षुद्र अह्म पर
---पुराने पन्ने पलटनें हैं
और सूखी यादें निकाल
फेंकनी है --सोचती हूँ
आज कर डालूं ये
बहुत दिनों से पेंडिग पड़ा है
लो ! गर्म ग्रीन टी के हर सिप के
साथ एक एक गिरह खोल दी
जो मकड़ी के जाल की तरह
लिपटी थी मुझसे ---और हाँ
कप की तलहटी में बची
ठंडी बेस्वाद चाय
उड़ेल दिया उस अंगारे पर
जो सब कुछ राख हो जाने
के बाद --कहीं सुलग रहा था
चलो अब चैन से ---
अपनी ग्रीन टी तो पी सकुंगी
हर सिप का मज़ा ले कर ---:)
-----------दिव्या ------------------

23-feb -2013

ये कैसी कशमकश --


ये कैसी  कशमकश 
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न जाने क्या उमड़ घुमड़ रहा है मन में 
ये कैसी ज़द्दोजहद चल रही --
कहतें है औरत जब प्रेम करती है 
तो उसकी आँखे बंद होती है 

वो कुछ नहीं देखना चाहती सिवा प्रेम के 
भावनाओं के सर्वोच्च शिखर पर बिठाती है 
वो अपने प्रेमी को --और वहीँ देखना चाहती है 
उसका प्रेम बहुत पाक पवित्र होता है 
तभी तो समर्पण तक जाता है 
पर पुरुष उसका प्रेम देह से शुरू होता है 
यदाकदा ही हर्दय में जा कर ठौर लेता है 
एक धारणा आजकल बहुत प्रबल है 
औरत को आज़ादी चाहिए --??
हाँ चाहिए अस्तित्व को बचाने की
पर बंधन उसे प्रिय भी है परिवार का 
प्रेम का यह बंधन कितना पवित्र है 
उससे बेहतर कौन जान सकता है 
टूट कर बिखरना फिर खुद ही 
खुद को समेटना कितना मुश्किल है 
यही सोच रही हूँ ----
-ये कैसी ज़द्दोजहद चल रही मन में 
कुछ कुछ होश सँभालने से लेकर 
साँसों की रिदम टूटने तक 
यही कशमश ही तो चलती है 
सही गलत पाप पुण्य ---------
--------ये जन्म अगला जन्म 
ये जन्म तो बिता दिया -----------
अगले जन्म का शिद्दत से इंतजार पर क्यूँ ?
अरे कुछ बाकी है उस जन्म में कर लेंगे 
पर वो सात जन्मो वाला रिश्ता न बाबा न 
वो नहीं उसका एक्स्टेंशन नहीं चाहिए 
खारिज़ कर देना वो बांड
 मैने अगर कभी भी  भरा था 

जो ताल्लुक बोझ बन जायें --
उन्हें ढोना ठीक है ?? --------------
एक दुसरे के साथ धोखा नहीं ये ?
जो सम्बन्ध मर जायें उन्हें दफना देना ही उचित 
वरना मरे हुए रिश्तों की सड़ांध
जीना मुश्किल कर देती हैं ----
कोई किसी को मैडल नहीं देता 
मन मिले तो मेला वरना 
सबसे भला अकेला -----------
मुखौटे लगा कर क्यूँ जीना --
न जाने क्या क्या उमड़ता घुमड़ता रहा 
आज मन में --उफ़ --------------
-----------------------दिव्या--------------------
22.2.2013

Thursday, 21 February 2013

एक मुट्ठी अहसास --------


एक मुट्ठी अहसास
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एक मुट्ठी अहसास ------
----------ढेर सारे शहद से
मीठे बोल जिन्हें --------
---------सुन बिन पिए ही
नशे में रहती थी मै -------
---------एक चुटकी मुस्कान
तुम्हारी सड़ी सी बेरुखी ---------
-----------सब बटोर कर मैने
पोटली में बांध के ----------
----------हवा को सौंप दिया
मेरे शहर की हवा भी इमानदार है
------------------वो पहुंचा देगी तुम तक
अब क्या करुँगी इनका ---------------
-------------तुम्हारा था तुम ही रख लो
मुझे लगा ये सच्ची है ----------------
-------------और अपना समझ बैठी
दर्द होता है इन्हें देख के ----------------
---------------अब मै भूलना चाहती हूँ
वो सब कुछ जो -------------------
----------मेरे लिए खूबसूरत सच था
और तुम्हारे लिए बस---------------
-------------यूँ ही  कामन सी  बातें
तुम बस एक छोटा सा -----------
--------काम कर देना वक्त मिले तो
बस मेरे लिए दुआ करना-------------
------------------मै तुम्हे भूल जाऊं
बस ये पहला और आखिरी ------
----------------काम जो तुमसे कहा
-----------करोगे न ???????
------------दिव्या --------------------

Sunday, 17 February 2013

मिसिंग यू माय विन्डो - - - -


मिसिंग यू माय विन्डो
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मुझे बहुत याद आई
अपने पहाड़ वाले घर की
वो खिड़की मेरी दोस्त ----
मेरी हमराज़ ---
कोई जंगला नहीं सिर्फ दो पल्ले थे
जो खुलते थे कब्रिस्तान की ओर
और मै तेरी चौखट पर सर रख बातें करती
कभी चाँद तारों से तो कभी -----
कब्रों में सोये अपने प्यारे दोस्तों से
और तू मेरे दिल की धडकन सुनती
कभी तेज़ कभी डूबती धडकनें
तू गवाह है मेरी तनहाइयों की
पर तेरे होते मै तन्हा कहाँ रही
वो बांसुरी की आवाज़ जो अक्सर
आधी रात को मुझे खींचती थी
मै बेचैन हो उठती जैसे
कोई डोर खीच रही हो ---
तू गवाह है मै नहीं गई कभी
किसी आवाज़ के पीछे --
मेरी अना सर उठा के खड़ी हो जाती
और कब्रों में सोये मेरे दोस्त
मेरा हाथ थाम लेते हाथ बढ़ा के
और तू भी तो अपने पल्ले बंद कर देती
मेरे जिद्दी दिल की तरह -मेरी खिड़की
मुझे तू बहुत याद आ रही है
---------------दिव्या -------------------
18..2..2013
 — 

वक्त बहता ही रहता है अविरल धारा की तरह


क्या षडयंत्र था न जाने 
पता ही न चला हमें 
वो साल जिसका स्वागत 
दिल खोल कर किया था 
जाते जाते मन दुखा गया 
और आने वाले साल को 
सौंप गया न जाने क्या क्या 
जो इसने आते ही दुःख अवसाद 
झोली भर दर्द के फूल जिसमें 
लगे थे कुछ शक के काँटे सौप दिए 
कभी न शंका करने वाला मन 
भी शंकित होने लगा --कही फिर तो 
काँटे नहीं है इस फूल के अंदर छुपे 
कुछ कोमल मन सख्त हुए 
वक्त का तकाज़ा था जीना तो है ही 
जिंदगी जीना सीखा देती है 
वक्त बहता रहता है अविरल धारा की तरह 
कभी निर्मल गंगाजल की भांति 
तो कभी गंदला भी होता है आहत हो 
पर समय पर छोड़ दिया --वक्त ही तो है 
अब इतना भी जबर नहीं की सत्य को हरा दे 
-----------------दिव्या ------------------------

Sunday, 10 February 2013

तुम क्या जानो --अगर जानते तो -


गुलमोहर की छतनारी छाँव में 
बैठ कर ग्रीन टी पीते हुए 
मैने पलके झुका कर 
चेहरा बाई तरफ घुमा लिया 
दाहिनी तरफ तुम जो थे 
मै नहीं चाहती थी तुम देखो 
मेरी आँखों में गुलमोहर का 
दहकता लाल रंग उतर आया है 
छोडो तुम नहीं समझोगे 
अगर समझते तो --मै 
नजरें ही क्यूँ फेरती ही 
--------दिव्या ----------------
 10.2.2013

Wednesday, 6 February 2013

भोर तो आ के रहेगी ---


भोर तो आकर रहेगी
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कितना भी हो घना अँधेरा
सुबह कुहासे की चादर फाड़
सूरज धीमी धीमी मुस्कान
बिखेरेगा ही -------------
भोर तो आकर रहेगा
मुझे मेरा मन कभी दुलार से
तो कभी डांट के समझाता है
पता है वो सच कह रहा है
नहीं निकल पा रही हूँ मै
उन लछमण रेखाओं के बाहर
जो मैने खुद ही खींच ली थी और
खुद को तुम्हारे साथ ही बंद कर लिया था जिसमें
क्या बताऊँ ? तुम्हें भी बताना होगा क्या
तुमको समझने में मै खुद को भूल गई थी
आशा और निराशा धूप छाँव सी आती जाती है
पर मुझे पता है वक्त लगेगा थोड़ा
लेकिन मैं निकल आऊँगी बाहर
अपनी ही खींची हुई परिधि से
तुम वापस आओगे जरुर पता है मुझे
पर तब तक कहीं पाषण न हो जाये
यह हर्दय जिसमे तुम थे तुम हो अभी भी
यह भी सत्य है तुम्हारी याद की गंध
हमेशा मेरे साथ ही रहेगी और साथ ही जायेगी
एक अकुलाहट सी होने लगी है अब
आखिर मेरे ही साथ क्यूं यह सब ??
क्यूं की अभी भी जब इतना समय गुज़र गया
काले केशों में चांदी भी उतरने लग गई
फिर भी मुझे किसी को छलना नहीं आया
चलो हर्दय का वह दरवाज़ा बंद ही कर देते है
जहाँ पीड़ा स्नेह अनुराग जा कर बैठ जाते हैं
न जाने क्यों इस मौन निशा में
मेरा मन इतना भर आया कब से तुम से
न जाने कितनी बातें करती रही और
समय का पता ही न चला की कब भोर हो गई
न जाने कितने जन्मों का नाता जो है तुम से
यह भी भूल गई तुम तो यहाँ नहीं हो
पर न जाने क्यूं लगता तुम यही मेरे पास ही हो
सुनो मेरे पास ही हो यह अहसास ही काफी है
हम रोज़ इसी तरह बातें करेंगे मुझे पता है
तुम सब सुन रहे हो न क्यूं की तुम तो
हमेशा मेरे साथ ही रहते हो -रहते हो न ??
-----------------दिव्या -----------------------------
पेंटिग --अज्ञात कलाकार

6.2.2013

Saturday, 2 February 2013

अतीत के कालखंड -----



अतीत के  कालखंड ---
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सन्नाटे भरी सर्द रात प्रथम पहर बीत चुका था --
खुली आँखों में सो रही थी --या यूँ कहे नींद कहीं नहीं थी
मेरे भीतर तेज़ी से एक सन्नाटा खींचने लगा --और फिर
मेरी ख़ामोशी मुखर हो उठी शायेद मुझसे बात करने के लिए
इन्ही एकाकी पलों को तलाशती रहती है -और मै बचती रहती हूँ
कहीं मेरी ख़ामोशी विद्रोह न कर दें --और फिर मैने
अपनी डांवाडोल मनस्तिथि को थपथपा कर --------------
एक खोखला दिलासा दिया --और बर्फीला मौन तान लिया
यूँ लगा अतीत का कालखंड हर वर्तमान के साथ -----------------
जुड़ गया क्यूँ कितना गूंथा था चीथड़े चिथड़े हुए वजूद को
लगा था दिल पर लगे इन पीड़ा के पैबन्दो को अब कोई
उधेड़ नहीं पायेगा ---सब कुछ तो बाँट लिया था तुमसे
पर माँ की पुरानी आलमारी के लाकर से मिले -----------------
दर्द के इन दस्तावेजों को मुट्ठी में मींच माघ की ---------------
सर्द बर्फीली रात में भी पसीने से नहा गई -----------------
मां ने सारे लिफाफे अपनी छोटी सी अनुभवहीन
बेटी से छुपा लिए थे वो सारे षडयंत्र कैद हो गए आलमारी में
पर माँ जानती थी बाबा भी जानते थे -यह सब पर मुझे क्यूँ नहीं
पढाया ---शायेद बाबा को संस्कारो और उसूलों के बीच पली बेटी पर
खुद से ज्यादा भरोसा था --पन्ने पलटे और पढ़ते पढ़ते वह खो उन दिनों में ----जब वह लौट आई थी जिसे लोग हनीमून कहते है दो महीने पहाड़ों में गुज़ार कर ---ससुराल वापस बाबा ने भाई को भेजा बहुत दिन कहाँ रह पाते थे मेरे बगैर मै बहुत खुश थी शादी के बाद पहली बार मायके जा रही थी --कार दरवाजे पर लगी थी --समान रखा जा चुका था कमरे दौड़ती हुई आई और बोली जा रहीं हूँ मै --ओके जाओ मै आऊंगा कह कर वो सो गया --एक झटका तो लगा पर माँ बाबा से मिलने की ख़ुशी में वह भूल गई --सासू माँ के पाँव छू कर ज्यू ही कार की तरफ बढ़ी दो हाथों ने पकड कर लिपटा लिया कुछ इस तरह से जोर से सीने में भींच लिया की उसे अजीब सा लगा --गाड़ी तक छोड़ने के बहाने अंदर बैठ जब वो लबें हाथ काँधे की परिधि पार कर अपनी सीमा रेखा का अतिक्रमण करने लगे तो
वह दूसरा दरवाज़ा खोल कर झट उतर गई -- अरे बैठो न क्या हुआ
एक आवाज़ आई देखा तो वह भी खड़ा था जो उसे सात फेरों में बांध कर लाया था --- रास्ते भर सोचती रही क्या यह भ्रम था --
आहत पंछी की भांति पिंजरे का जीवन स्वीकारना ही था उसे कहाँ जाती क्या करती इतनी बड़ी भी नहीं की झट निर्णय ले लेती नहीं इतनी छोटी की गलत समझौते कर लेती --फिर समाज में लोग उसका उदहारण देते क्या महारानी जैसी किस्मत है देश के धनाढ्य लोगों में से एक परिवार की कुलबधू थी --उसे खुद पे तो तरस आता चिढ भी होती उस --सोकाल्ड पति से जो उसके बच्चों का बाप था जिसे सिर्फ पैसा ही दीखता --उन दिनों वह एक छोटी उम्र की अनुभवहीन लड़की ही तो थी ------------------
जो खुद अपने बच्चो की चाकलेट खुद खा जाती थी --जिसे हर लड़की की
तरह पढने का बहुत शौक था --असीम आकाश में उड़ने को आतुर उसके
नन्हे पंख कभी आत्मविश्वास से भर फडफडा उठते तो कभी वह
खुद ही आकाश का असीम विस्तार देख सहम जाती --अकेली जो थी
-नन्हे नन्हे बच्चे और वह खुद -- झूल रही थी एक अजीब कशमश में --पति और उसकी परस्पर मानसिक विसंगतियां उसे अंदर तक झिंझोड़ती रहती जाने अनजाने एक घृणा पनपती गई प्रेम तो हुआ ही नहीं पर बच्चे जरुर हो गए -- अंत भी वही जो इन जैसे रिश्तों का होता है - कभी कभी एक संशय भी मन में पलता कहीं सच में तो मै जिद्दी नहीं --क्या मै गलत थी ---आज हथेली में मिचा हुआ यह कागज़ मुझे इस सोच से भी मुक्त कर गया - बरसों पहले रचे गए षडयंत्र सब इस दस्तावेज़ में सबूत के रूप में है न कह कर वो चीख कर रोती रही सब कुछ तो साफ़ लिखा था इसमें उसकी पढ़ाई बंद करवाने के बारे उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की हर सलाह देता रहा पत्र में ----------------
एक पिता क्यूँ की उसका पुरुषोचित अहम चोटिल हुआ -------
एक साधारण लड़की के द्वारा जिसने उसके हीरे जवाहरात को
ठोकर मार दिया और अपने बाबा के संस्कार चुन सदा के लिए
बनवास ले लिया --क्यूँ की उसकी प्रतिरोध और बचाव के लिए उठती
उसकी आवाज़ खामोशी में घुटती जा रही थी --- सुनो मैने ठीक किया न
अचानक वह पूंछ बैठी मुझसे ---मै जड़ स्तब्ध सब सुन रही थी --
और फिर मैने अपने बगल लेटी उस लड़की को अपने सीने में छुपा लिया -- उसका दर्द अपनी आँखों भर लिया --नींद की ढेर सारी गोलियां उसे डांट कर खिला दी और थपक थपक के उसे सुलाते हुए मै यही सोच रही थी --अतीत तो अतीत था वर्तमान ने भी क्या कम रुलाया ---डर लगने लगा अब प्यार प्रेम कहाँ है अगर कहीं है तो इसके हिस्से में क्यों नहीं --बंद आँखों के भयावह अंधेरों में उसकी दर्द भरी ध्वनि मेरे कानो में प्रतिध्वनि सी गूंजती रहती है -----उसका हाथ थामे मुझे यूँ लग रहा है मानो उसका हर
स्पंदन ये कह रहा हो मेरा क्या कसूर था ---
-----------------------------------दिव्या ---------------------------------------
एक अजनबी लड़की की कहानी के कुछ अंश --जो मै लिख रही हूँ