Tuesday, 30 April 2013

तुम्हारे साथ तो मौन में भी संगीत है --


तुम्हारा साथ

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तुम्हारे साथ तो ----

------मौन में भी संगीत

सुनाई देता था -----

-----आज भी मेरी नींदे

तुम पर उधार हैं

----सोई नहीं न कितनी रातें से

तुम से बात करते हुये

-------पता ही न चलता

कब रात गुज़र गई

--------खिड़की से सूरज जब

मुहँ चिढ़ाता ----मुझे

-------अचानक ध्यान आता

अरे मै पसीने से तरबतर हूं कैसे ?

ओह A.C-तो दूर मैने

------- पंखा भी नहीं चलाया

कुछ ऐसा है तुम्हारा अहसास

--------तुम्हारे यहाँ होने कि अनुभूति

-फिर बाकी कहाँ कुछ याद रहता है

-----कितनी भी दूर हो पर

तुम यही हो मेरे आसपास

--------आज भी मै जागती हूं

उस समय तक जो ----------

-------हमारा होता था हम दोनों का

मेरे पास ही होते हो --------

------जानते हो मेरी बाई आँख

अक्सर जब फड़कती है -----

------मुझे पता चल जाता है

तुम मुझे याद कर रहे हो

------मानों या न मानो ------

तुम्हारे साथ हर मौसम

-----बसंत जैसा है -----

तुम्हारे बिन उफ़ तुम्हें पता है न

----मौन रहो पर पास रहो

कुछ ज्यादा तो नहीं चाहा न

ये तो ह्क़ है ही  मेरा -----

-------Divya Shukla--------

1--5--2013

पेंटिग गूगल से

Monday, 22 April 2013

झरती रही सूखी गर्म राख -----



झरती रही सूखी गर्म  राख
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शफ्फाक सफ़ेद चादर पे ----
---------टंकी दो काली आँखे
उफ़ खाली आँखे में----------
------- दर्द की ये कैसी सिहरन
रूह की गहराईयों से---------
----------ज़ज्बात की खुनक
कौन आया ?फिर गया ही क्यूँ
अंदर बाहर सब धुआं धुँआ
सुलगती रही रूह सब राख हुआ
आँखों से झरती रही सूखी गर्म राख
उसी राख में एक अस्तित्व दफ़न हुआ
काली जिल्द वाली खाली किताब लिए
मौत खड़ी रही हस्ताक्षर के लिए
और उसने उसे निराश नहीं किया
------------Divya Shukla----------------
22--4--2013
पेंटिग गूगल से



Saturday, 20 April 2013

ये तितलियाँ -क्यूँ बदल जाती हैं ?


ये तितलियाँ -क्यूँ बदल जाती हैं ?

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कभी सोचा है किसी ने

छोटी मासूम तितलियाँ

ततैया जैसी क्यूँ बन जाती है

नहीं न --तो सोचो

कहाँ कहाँ से गुजरती हैं

अपनी मिठास खो कर

जब नीम सी कड़वी

जुबान हो जाती है

वो उगलती है

वैसी ही गालियाँ

जो माँ देती है गली में

खड़े शोहदों को --तो कभी

बड़े घरों के साहबों को

झुग्गी बस्तियों में उम्र से पहले ही

समझदार हो जाती हैं ये बच्चियां

वो क्या बताएं जब सुबह

वो बाहर नहाती हैं एकलौते

म्युनिसपलटी के नल पर

तो सामने बालकनी से

दादा पोते दोनों घूरते हैं

पकडे जाने पर बडबडाते भी


कितनी बेशर्मी फैला रखी है

सरकार कुछ करती भी नहीं

वी आई पी कालोनी का कबाड़ा

बना के रख दिया इन झुग्गीवालों ने

तब कड़वी हो जाती है

इनकी की जुबान -----

साले -नासपीटे काहे नहीं

बनवा देते गुसलखाना --

और तो और आज जब

वो कोठी वाला साब बड़े

प्यार से कहने लगा

कोई जरूरत हो तो मुझे

कहना ----पर उसकी

नज़रें भटक रही थी

कहीं कहीं फटी हुई

ड्रेस के आर पार

तब भी कड़वी हुई थी जुबान

हरामी कमीना पहचानता भी

नहीं ये ड्रेस उसकी बेटी की ही तो है

कैसे पहचानता वो उसे ---

बेटी की उम्र की ये नन्ही लड़की

औरत का जिस्म ही तो लगी थी

ये कड़वी जुबान कभी कभी

बचा ले जाती है इन्हें

यही तो एक मात्र हथियार है

इनका --पर इनका मन तितलियों जैसा है

जो देखना हो तो देखो कभी

जब इकट्ठी होती है ये

इतवार वाली फुटपाथ बाज़ार में

नन्ही नन्ही चहकती चिडयों जैसी

छोटी छोटी खुशियाँ खरीदती हुई

-----------Divya Shukla----------

पेंटिग अज्ञात कलाकार

19-4--2013

Sunday, 14 April 2013

उत्तर दो रघुनंदन -----




उत्तर दो रघुनंदन

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हे आर्य पुत्र मेरी

शंका का समाधान करो

मै धरा -नंदिनी सीता आज

तुमसे एक प्रश्न पूछती हूँ

वो पुत्र तुम ही हो न

जिसने पिता के वचन हेतु

चौदह साल का बन गमन

सहर्ष स्वीकारा परन्तु

पत्नी को दिए सात वचन

तुम कैसे भूल गये

हे राघव तुम भले ही

मातृपितृ भक्त हो

अनुकरणीय भ्राता भी

परन्तु क्या तुम

उपमेय पति हो ?

अपनी आसन्नप्रसवा पत्नी को

बन भेज कर तुमने किस -

मर्यादा का पालन किया

जो तुम्हारे ही वंशज को

अपने रक्त मांस से पोस रही थी

उसे बन की कठोर जीवन शैली

सौंपते हुए तुम्हारा ह्रदय नहीं कांपा

तुममें इतना भी साहस न था

कि उसे उसका अपराध बता कर

स्वयं छोड़ आते --परन्तु

लघु भ्राता द्वारा भेज तुमने

अपना अपराध बोध तो

स्वयं ही सिद्ध कर दिया-

अयोध्या नरेश ये कैसा न्याय है ?

कैसी मर्यादा है मर्यादापुरुषोत्तम ?

अब क्या कहूँ --नहीं कहूँगी कुछ

मै अनुगामिनी हूँ तुम्हारी --

हे रघुवीर वन गमन के समय

तुम्हारे साथ आने का निर्णय मेरा था

पतिधर्म में कौन सी कमी रह गई थी

जो मेरी अग्नि परीक्षा ली तुमनें

हे राघव दुःख और कठिन परीक्षा की

घड़ी में छाया की भाँती साथ रही

अपनी ही अनुगामिनी को

धोबी के मात्र दो बोलों पे त्याग दिया

जाओ दशरथंनंदन मै जनकनंदिनी वसुधापुत्री

सीता तुम्हे क्षमा करती हूँ जानते हो आर्य पुत्र

मै धरा की पुत्री हूँ माता का धैर्य है मुझमें

तुम्हारे पुत्र तुम्हे सौंप --मै अपनी माँ की गोद में

विश्राम करती हूँ --हे रघुवीर तुम्हे त्याग कर

सदा के लिए --बस यही प्रतिकार है मेरा

मुझे ज्ञात है तुम अनुत्तरित ही रहोगे

-----------Divya Shukla----------------

28--11-2012

सीतामढ़ी के मंदिर में - माँ सीता की प्रतिमा


Saturday, 6 April 2013

ये रेशमी अहसास तुम्हारे ----


ये रेशमी अहसास तुम्हारे

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मेरा उलाहना

तुम्हारा मुस्कराना

चलो हटो जाओ

उफ़ हद हो गई

तुम तो टूर पर हो

और मै तुम्हारे

ख्यालों के टूर पर

सोचते ही -----

मीठी सी मुस्कान

तैर गई होठों पर

धीमे से आँख मूंद ली

पास आ गई तुम्हारे

चलो चलें --कहाँ ?

सोने ----देर हो गई न

रात बहुत हो गई

कौन बोला ये ? --तुम न

ये रेशमी अहसास ----

ये आवाज़ तुम्हारी

ही हो सकती है

इन दीवारों में

बिस्तर मे किताबों

छोड़ जाते हो न

मेरी देखभाल को

जब तुम यहाँ नहीं होते हो

पर फ़िक्र तो तुम्हें

रहती ही है ---

है न ?---सच कहा न ?

अब इतना तो

तुम्हें जानती ही हूँ मै

-------Divya Shukla----------

6-4-2013

पेंटिग --अज्ञात कलाकार

Friday, 5 April 2013

कुछ यूँ है तुम्हारा प्रेम --कुछ ऐसा है मेरा प्रेम :)


कुछ यूँ है तुम्हारा प्रेम ---

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पिनक जाना ---:))

तुनकमिजाजी थोड़ी सी

रूठ जाना

बिना बात के

कुछ ऐसा ही है

तुम्हारा प्रेम

मेरे लिये

मुझे पता है

प्रेम तो तुम

मुझसे ही करते हो

यूँ रूठ रूठ के

सच कहा न ????

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कुछ ऐसा है मेरा प्रेम
===========

भीड़ मे अलग थे

कुछ तो खास था

क्लिक कर गया

मुझे तुम भा गये

उलझा सा सुलझा सा

ये व्यक्तित्व बस

दिल मे कहीं गहरे

तक उतर गया --

कोई अवगुन नहीं

नज़र आता मुझे

बस तुम और तुम

सच कहा न ---

तुम तो जानते हो

पर मानते नहीं

जिद्दी हो न

जैसे भी हो जो भी हो

बस मेरे हो --------

-------Divya Shukla------

6-4-2013

Pic --google --
 

विंटर सिंड्रोम --या अतीत के धागे ---


विंटर सिंड्रोम --या अतीत के धागे ---

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ठंड ने बरसों का रिकार्ड तोड़ दिया

टी वी चीख रहा है और मै

ब्लैंकेट लपेटे अभी भी बिस्तर में हूँ

एक अवसाद सा है शायेद विंटर सिंड्रोम ही हो

जिंदगी परत दरपरत --फिर खुल गई

पलट रही ही थी बंद पन्नो को --

अतीत के उलझे धागों का सिरा

नाख़ून में फंस कर उधड़ने लगा

पीछे मुड़ कर देखने का मन नही

फिर एक टीस सी उठी अचानक ---

पीले जर्जर पन्ने फडफडा कर

खुदबखुद पलटने लगे --

उस उम्र में अमूमन लड़कियां

अपने एम्बिशन में लगी रहती थी

या फिर उन हैंडसम बोयज़ के बारे में

जो सिर्फ स्कूल आते और छुट्टी के वक्त

नियम से खड़े रहते थे बस दूरदर्शन हेतु

छोटे से शहर में इतना बहुत था --

फिर अचानक मेरा प्रमोशन हुआ

इस प्रमोशन नें बहुत कुछ छीन लिया

जैसे गर्म पुलोवर बुनते बुनते

सलाइयों से कुछ फंदे फिसल जाएँ

और तैयार पुलोवर में छेद नजर आये

ऐसा की ऊन का एक सिरा खींचते ही

पूरा स्वेटर खुल जाए ---वक्त गुजरता रहा

और सब देखो और मौन साध लो

इसी तर्ज़ पर जिंदगी खिसकती रही

कीचड़ से खुद को बचाते हुए भी

परिवार में चकरघिन्नी बनी रही -----
-
और समाज में उफ़ सो काल्ड इमेज़ का भी ध्यान --

पर इन सब के बीच होने वाले अनुभव

उफ़ कैसा कैसेला कड़वा स्वाद छोड़ गए जीवन में

मेरा परिवार मेरा परिवेश राजविलास सी जिंदगी

ऐसे में अर्थहीन होता मेरा जीवन --किसी ने सोचा ?

किसी की मधुर दस्तक से कभी भावनाओं में बहती गईं

खुद की पाली हुई एक्सपेक्टेशन को दरकते देख

अचानक हल्के से झटके से बिखर भी जाती

फिर एक बेवकूफी भरा ख्याल आता

काश की मेरा कोई पहला प्रेमी होता

अचानक आता और कहता --सुनो

तुम कब तक मुझे इग्नोर करोगी

तुम मुझे यूँ ही उलझी सुलझी सी

बेहद मूडी विगत सहित ही मिल जाओ

और मै तब --न जाने क्या कहती

न जाने क्या करती ----

या शायेद उसे ही देख के

मुस्करा भर देती -----:))))

वरना यह अतीत के धागे तो अब

बढती उम्र का अहसास कराने के साथ

दिल पे एक खरोंच डाल जाते है

पतंग के मांझे की तरह -----

---------Divya Shukla--------------

9-1-2013

पेंटिग  गूगल  से
कलाकार  अज्ञात 

Monday, 1 April 2013

शब्दों के पुल और एक खामोश नदी


शब्दों के पुल और एक  खामोश नदी

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ख्यालों की रात ---

समेटे हुये अपने अंदर

खामोश बहती जा रही

यादों की नदी -----

निरंतर न जाने कब से

घंटो तट पे बैठ ----

अपलक निहारती मै --

फिर न जाने कब

कल्पनाओं मे शब्दों के

पुल बना नदी के पार

उतर जाती ------

आज फिर आ बैठी

वहीँ यादों की भवंर मे

डूबने उतराने को --

रात गहराती जा रही

चाँद भी है --पर

न जाने चाँद रूठा है

या चाँद से रात रूठ गई

गहरी काली रात

मेरे ख्यालों की -----

और फिर आसमां ने

मन पढ़ लिया ------

बादलों से नमी ले कर

बूंदे टपका दी -----

और मेरी सूखी

आँखे नम् हो गई

हवा के झोंके से

यूँ लगा जैसे

मुझे छू कर कोई

पास से गुज़रा

और धीमे से कानों में कहा -----

मै यही तो हूँ तुम्हारे आस पास

आँखे मूंद कर देखो तो सही

चलो भरम ही सही ---

पर इक पल को लगा

तुम आ गये -------

-----Divya Shukla-----

30-5-2012

पेंटिग गूगल से