Tuesday, 28 May 2013

Take Your Time - वापस आ जा --



Take Your Time - वापस आ जा

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न जाने कब से खुद में गुम थी मै

वो कब आई पता नहीं ------

पुकारती फिर रही थी जोर जोर से

ऐ सुन कहाँ है तू --किस लोक में गुम है ?

सारे घर में आंधी तूफान की तरह

शोर मचाते हुए मुझे खोजती रही

एकदम से उसे ख्याल आया और

वह होमथियेटर की तरफ आई

धाड़ से हाथ मार के दरवाज़ा खोला

और बोली अरे वाह तू यहाँ ?

सामने मूवी चल थी Full Volume में --

चेहरे पे BOOK औंधी रख के

मै Recliner पर आगे पीछे आँखे मूंदे झूल रही थी

मुझे कंधे से पकड कर जोर से हिला के चीख पड़ी

क्या करूँ तेरा --फिर से तू गुम हो गई खुद में

अब क्या हुआ ? चल उठ उफ़ फिर से दौरा पड़ा तुझे

बिना उसकी ओर देखे ही मैने कहा अरे हट

दौरा पड़ा नहीं अब ख़तम हुआ --बस फिल्म देख रही थी

ठहाके मार के वो बोली अच्छा पहली जाना

तेरी ये क्वालिटी बस तू ही कर सकती है

आँख मूंद कर फिल्म देखना वाह क्या बात है

उसका हाथ थाम के कहा मैने देख

मन ही तो है घटता बढता रहता है

चाँद सा तू नहीं समझेगी --मुझे समझना भी नहीं

और तुझे समझा भी नहीं सकती -वो उकता के बोली

तू और तेरे सूरज चाँद सितारे तू ही जाने

मेरी समझ में नहीं आता ये सब --

कितनी अजीब है तू --क्यूँ है ऐसी

जिस तरह से आँखे मूंद कर फिल्म देख रही है

उसी तरह आँखे मूंद कर जिंदगी भी देखती है

फिर रोती है --अब छोड़ यार कैसी जिद्दी है तू

एकदम नहीं बदलती ---थोडा सा बदल खुद को

भीग गई मेरी पलकें --भरे गले से बोली

------अरे ना सुन तो अब बदल रही हूँ खुद को

चाँद को छूता तो है मन पर --अब और नहीं

अब मुझे चाँद नहीं चाहिए -----

क्यूँ अरे क्या हुआ ? -- मेरे करीब आई और

मुझे जोर से HUG किया उसने कुछ देर मौन रही

मेरा हाथ थाम के बैठी रही मेरी बचपन की दोस्त

फिर नम आँखों से मुझे देख बोली कोई बात नहीं

तू आँखे मूंद के फिल्म देख मै काफी भिजवाती हूँ

पर सुन हां Take Your Time --और वापस आ जा

तब तक तुझे अकेला छोडती हूँ ---मुझे पता है

तू जल्दी निकल आएगी -----

-----------Divya Shukla------------

28--5-2013

Saturday, 18 May 2013

सुनो --देखो न


सुनो --देखो न

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आधे अधूरे ख्वाबों को

तो लपेट के रख दिया था

मन की चादर में --

अर्धनिंद्रा में ली करवट

चमक गई बगल की

खाली तकिया पे

मेरी सुर्ख लाल बिंदी

न जाने फिर क्यूँ कैसे

सपने चादर से फिसल

मेरी अधखुली पलकों पे

टंक गये ---

आंखे की कोर से

तनिक सा काजल ले

टीक दिया --तकिये पे

अब नहीं लगेगी --

किसी की बुरी नज़र

आँखे मूंद कर मैने

गहरी सांस ली

अहसास ही बहुत है

तुम्हारे होने का ---

-----Divya Shukla-------

18-5-2013

पेंटिग गूगल से

Sunday, 12 May 2013

धीमी धीमी दस्तकें


धीमी धीमी दस्तकें

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चुपचाप रात् सरकती जा रही है

मै टैरेस पर निकल आई

सोचा नींद को आवाज़ दे कर देखूं

शायेद आ ही जाए पर न जाने कहाँ

भटक रही थी आज --रूठ के

शून्य में निहारती खड़ी हुई --

बीते वक्त को मन ही मन दुहरा रही थी

पर जिंदगी को जितनी बार भी जोड़ा घटाया

हर बार अपने हिस्से में शून्य ही आया

सामने मेरे हाथो से लगाया हुआ

मौलश्री का ऊँचा सा पेड़ खड़ा है --

आजकल छोटे छोटे सफ़ेद फूलों से भरा है

पर न जाने कहाँ खो गई है उसकी सुगंध

अरे ! मै भी तो इसी तो पेड़ की तरह ही हूँ न

इसमें जान तो है पर जड़ है यह

और मै भी तो ऐसी ही हूँ न

मेरी जड़े इस जमीन की गहराईयों में

अंदर तक जकड़ चुकी है की अब

चाह के भी एक कदम हिल भी नहीं सकती

पर कभी कभी लगता है कोई है

और दिल के बहुत करीब से

फिर एक आवाज़ आती है

सुनो ! तो मै हूँ न --

न जाने कौन है वो जो

धीमी धीमी दस्तकें देता है

एक अजीब सी बेचैनी और

बेखुदी में मेरे हाथ

बंद दरवाज़े तक बढते हैं पर

अचानक कदम ठिठक जाते हैं

तभी कोई कानो में धीमे से

फुसफुसाता है इतनी जल्दी

भूल गई तुमने वादा किया है न

मुझसे अगले जनम का ---

जिंदगी तो बीत ही जाती है

या यूँ कहो रीत जाती है ---

और फिर अगले जनम का

एक लंबा इंतजार शायेद भरम भी हो

बस सोच के मुस्कान तैर गई और

याद आ गया किसी से किया हुआ

एक वादा - अगले जनम का

पता है मुझे मजाक किया था

उसने पर सच में मै

मुस्करा जरुर दी थोड़ी शर्म भी आई

कुछ रिश्ते नेह के भी होते हैं

इतने सुंदर कि उन्हें

नाम की कोई जरूरत नहीं होती

-------Divya Shukla----------

12-5-2013

तस्वीर गूगल से साभार

हर दिन का बस एक पल मेरा हो


हर दिन का बस एक पल मेरा हो

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--------------- मुझे साल का एक दिन नहीं

------हर दिन का बस एक पल ही देते रहना तुम सब ------------

माँ हूँ तुम्हारी मेरी जान तुम् में बसती है

-------------मुझे पता है अब तुम सब बड़े हो गये हो

परिन्दे भी जब बसेरा बदलते हैं --------

-----तो पेड़ बहुत तन्हा हो जाता है ------

बच्चों से बड़ी तो कोई भी जागीर नहीं होती ----किसी माँ के लिये

पर मै ये भी जानती हूँ बहुत काम हैं तुम्हें ----पर क्या करूँ

-----मेरी जान तुममे बसती है ----माँ हूँ न --

तुमने कुछ खाया या नहीं --सोच कर ही

-----हाथ का निवाला गिर जाता है ---

लापरवाह हो न ---मै कैसे खा सकती हूँ बोलो ?

----तुम तो ड्राइव भी कितनी तेज करते हो ----

मै जब भी फोन करती हूँ ----जोर से हँसते हो

मम्मा मै बच्चा नहीं हूँ ----अच्छा अभी फोन करता हूँ

--------------फिर बिजी हो जाते --मै तो जानती हूँ तुम्हें ---

कभी तुम्हारा फोन न मिले तो ---तुम नहीं जानते

--------न जाने कितनी बार मर जाती है तेरी माँ ------

तेरी आवाज़ सुन कर जान मे जान आती है -----------

------रोज़ जब तक तू बिस्तर मे नहीं जाता --------

कहाँ सो पाती है माँ ----क्या करूँ दिल से मजबूर है तेरी माँ

----------मेरे लिये तो आज भी उतने ही बड़े हो तुम सब

जब पहली बार तुम्हें गोद उठाया था ---------------

------बस कुछ पल तेरे तेरी माँ की उम्र बढ़ा देते हैं --------

बस हर दिन के कुछ पल माँ के नाम करते रहना ----

---------------Divya Shukla-----------------

अपने बच्चो से हर माँ के मन की बात

पेंटिग गूगल से --

Friday, 10 May 2013

गीली आँखों के सूखते सपने --


गीली आँखों के सूखते सपने

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मासूम आँखों में

तिर रहे हैं कुछ प्रश्न

आक्रोश भरे --

क्या हमें पानी भी

नहीं मिल सकता ?

जितना पानी व्यर्थ

बहाते हो तुम सब

हम और हमारे ढोर

उतने में ही अपनी

प्यास बुझाते हैं

पता भी है तुम्हे

नालियों से गड्ढों से

पानी पीना कैसा होता है

पर जीना है तो पीना है

ऐसे में कैसे सपने देखें

किताबों के खिलौने के

पता है अम्मा के चौके में

चूल्हे पे चढ़ी बटलोई में

खदकते अदहन की आवाज़

आती है दूसरे तीसरे दिन

तभी कौंध जाता है एक सपना

भरे पेट सोने का -तिर जाती है मुस्कान

पर अक्सर ऐसा भी होता है

जब अदहन सूख जाता है

बटलोई में ही खदक के

और अम्मा की सिसकी से

जो आँचल मुंह में ठूसने पर

मुंह से बाहर निकल ही आती है

लाख कोशिशों के बावजूद भी

तब टूटता है जो सपना

हम माई बाबा को उसकी

भनक भी नहीं लगने देते

भूख को तो पानी पी कर

टरका देते है पर अब

तुम ही बताओ बाबू

पानी के बिना कैसे जियें ?

--------Divya Shukla----------

Wednesday, 8 May 2013

सुनो !! रुकोगी नहीं

सुनो !!रुकोगी नहीं -?
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सुनो ! रुकोगी नहीं ?
नहीं नहीं कैसे ? अब नहीं
अब तो दहलीज़ पार कर ली
तुम्हारी बनाई लक्ष्मण रेखा भी
फिर मेरी जरूरत क्यूँ ------
बहुत कोशिश की तो थी मैने
पर हुआ क्या --क्या मिला
सिर्फ यही न तुम्हे तो अक्ल ही नहीं
बुद्धू हो न ---सड़क तक क्रोस नहीं कर पाती
तुम तो बिना मेरा हाथ पकडे ----अब क्या कहती
कर सकती हूँ मै ---तुम समझते क्यूँ  नहीं
मुझे तुम्हारा हाथ पकड़ना होता है न
बाइक पर पीछे बैठ बारिश में भीगना
उफ़ कितना अच्छा लगता है मुझे
क्या कभी जान पाये तुम --नहीं ना
तुम तो सिर्फ और सिर्फ झगड़ना जानते थे
याद है तुम्हे कितना डांटा था मुझे
कितनी छोटी सी बात थी
गाडी मोड़ते हुए तुमने कहा
हाथ दो --और मै कुछ देर सोचती रही
फिर झट तुम्हेहाथ थमा  कर कहा लो
कितना गुस्सा किया तुमने
अब इतनी भी अक्ल नहीं तुझे
खूब रोई थी उस दिन  मै --
मुझे ट्रेफिक रूल कहाँ मालुम
और फिर एक गहरा  निशान
और बन  गया  दिल पर
ऐसे न जाने कितने घाव होते रहे
अच्छी लड़कियां इतना हंसती नहीं
तुम हमेशा कहते --और मै चुप हो जाती
धीरे धीरे भूल गई खिलखिला के हँसना
परन्तु आजकल जो तुम्हे देख रही हूँ न --
तुम वो नहीं जो मेरे साथ होते हो
कोई गैर सा पुरुष ----कित्ता गुस्सा आया मुझे
नहीं जलन नहीं ---सिर्फ क्रोध वो भी खुद पर
ठीक कहा तुमने तुम पुरुष हो -----
--यह तो जायज़ है तुम्हारे लिए ---
सजावटी सामान ही तो थी मै
अच्छे शो रूम से लाई हई ब्रांडेड वस्तु
सोसाईटी में बगल खड़े होने के लिए
तुम्हारे वंश को बढाने के लिए
बिस्तर की सिलवटें बनाने फिर उन्हें मिटाने के लिए
लाइसेंस ले कर लाई हुई औरत ---
----ये सब करते करते भूल गई थी खुद को
नहीं अब नहीं ---सुनो ! तुमसे सिर्फ
एक सवाल का जवाब चाहिए दोगे
क्या तुमने जो किया --वह मै करती
तब भी तुम यही कहते मुझसे
रुकोगी नहीं ---नहीं ना --
फिर मै कैसे रुक सकती हूँ ----
सच सुन सकोगे --सुनो
बहुत कोशिश की पर तुम्हारे लिए
अब कुछ नहीं बचा मेरे पास
न --मन में --न ही जीवन में
कहते हैं न --प्रेम का धागा न तोड़ो
जोड़े से फिर न जुडे --जुड़े गाँठ पड़ जाए
कभी कभी तो मेरा दिल भी करता है
थोडा जी लूँ कुछ पल ही को सही
खोल दूँ मन के दरवाजे जिन पर जंग लग गई है
--------------Divya Shukla------------------

8-5-2013
पेंटिग गूगल से साभार


Tuesday, 7 May 2013

सुनो !! आज कह दो न --


सुनो ! आज कह दो न

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मौन निस्तब्ध रात -------

-----मै खुले आसमान के नीचे

देर से चाँद को निहारती बैठी हूँ ----

आकाश में तैरता हुआ -

आधा चाँद ऐसा लग रहा है

मानो नील नदी में तैरती

चांदी की नौका हो ----

रातरानी की भीनी सुगंध

मुझे खींच कर अपने पास

ले ही आई ----बहुत उदास है  मन

कुछ कुछ तुम से नाराज़ भी हूँ

--क्यूँ सताते हो मुझे ----

निठुर हो तुम निर्मोही

तुमने तो कहा था हमारा साथ

जन्मो का है पर कहाँ हो तुम

सिर्फ मेरी कल्पनाओं में ही क्यूँ

सुनो ! मेरी दोनों हथेलियों को

अपने हाथो में बंद कर कह दो न

तुम मेरे कौन हो --बोल ही दो

स्वप्न में या तंद्रा में ही सही

मुझे पता है कुछ नाते

परे होते है इस दुनिया से

और तुम मेरे वही मीत हो

बोलो न कनु हो न ?

न जाने कब से मै बाते कर रही थी

पता ही न चला अचानक उपर देखा

तो चांद मुस्करा दिया बोला उठो

चलो सोने अब रात्री का अंतिम पहर भी

बीत चला अब मै भी जा रहा हूँ --

चांद को विदा बोल मै उठ गई

सोच रही हूँ अब कुछ दिन बाद

अमावस्या फिर से आ जायेगी

और रातें सियाह होने लगेगी

तुम नहीं जानते कनु ?

एक बात बतानी है तुम्हे

रातों की ये काली सियाही -

इन्हें अब मै आँखों में

काजल की जगह आंज लेती हूँ

तुम्हे बहुत पसंद हैं न

मेरी काजल वाली आँखे

तुम जब भी चाहना

खुद को देख लेना

--------Divya Shukla-------

7-5-2013

पेंटिंग गूगल से

Saturday, 4 May 2013

तुम्हारा दिया अगर तुम्हे लौटा दूँ तो ?



तुम्हारा दिया अगर तुम्हे लौटा दूँ तो ? 
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देर तक सोने वाली मै न जाने क्यूँ

आज सूरज की पहली किरण के साथ ही

उठ गई सच कहूँ तो सोई ही नहीं --

अमूमन ठंडी चाय पीने वाली मै

बहुत गर्म सिप ले रही थी

कोशिश थी इसी से जला दूँ

सारी कड़वाहट सारा आक्रोश जो

धीरे धीरे जम गया है मन में --

जरा जरा सी बात पर ---

तुम्हारा आहत होता अहम

मुझे रुला के ही संतुष्ट होता

पर तुम नहीं जानते थे शायेद

ह्रदय में भरा निश्चल निस्वार्थ

प्रेम घटता ही गया और फिर

एक दिन पाषण में बदल गया

पर तुम्हे क्या तुम तो पुरुष हो

तुम्हारे लिए प्रेम का अर्थ कुछ और है

ये इमोशन ये आंसू सब बकवास हैं

हमारा स्वाभिमान जिसे लेकर

तुम्हारे पास आते हैं वो तो सबसे बड़ा

खतरा है तुम्हारे अहंकार पर ---

उसे चूर चूर करने में सारा जीवन

सारी शक्ति सारे दांव पेंच लगा डालते हो

पर क्या कर पाते हो नहीं न ----

जितनी बार जितने रूपों में

तुम्हारा अहम मेरे सामने

विषैले नाग की भाँती फन फैलाये

फुफकारता आ खड़ा होता है

तुम्हारे जहर को दरकिनार कर

अपने वजूद के बिखरे टुकड़ों को

समेटती हूँ --अपनी रीढ़ की हड्डी को

और भी मजबूत सीधा कर सारी ताकत

बटोर हर बार तुम्हारी आँखों में झाँकती हूँ

नहीं चाहिए दो बूंद गंगाजल तुम्हारे हाथ से

अपनी अंतिम सांसो के लिए ------

उस गांधारी का प्रतीक हूँ

जिसने पिता के निर्णय के प्रतिकार स्वरूप

आँखों में पट्टी बाँध ली थी ----

जिसका एक वाक्य श्री कृष्ण के

पैरों में बहेलिये का तीर बन चुभा था

बस अन्तस् से निकले इसी वाक्य से

बचना तुम ------------

--तुम्हारा दिया अगर ------

सारा का सारा तुम्हे लौटा दूँ

तो तुम सभाल पाओगे क्या ?

ये ही सोच कर देर तक हंसती रही

कमजोर हो तुम ---चलो जाओ

----------Divya Shukla-----------

4--5--2013

पेंटिग गूगल से

अज्ञात कलाकार