Saturday, 27 July 2013

बेटियां नहीं होती का इन निगोडों के



बेटियां नहीं होती का इनके

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सब्जीमंडी ---एक कोना

--------मासूम सी वो लड़की

मछली जैसी आँखे --------

-------गहरा सांवला रंग तीखे नख्श

सब्जी का टोकरा सामने-------

--------सब से ज्यादा बिक्री होती

लोग सब्जी ही नहीं ---------

-------उसका चेहरा भी ले जाते

सब्जी के थैले में -----------

--------दूर बैठी उसकी बूढी माँ

ताकती है तना रहता चेहरा ----

-------फिर झटक देती मन से

बेबसी ही तो है माँ की --------

------गरीबी और चार पैसे का मोह

बच्चों की जरूरतें ---मज़बूरी है-----

------जिन आँखों को बेटी नहीं पढ़ पाती

माँ जानती है ----दूर से ही ---------

बेटी को देखती है ---कोसती है मज़बूरी को

---------गरीबी को महंगाई को

-उन आँखों को भी ---------

-----मुंह ही मुंह मे अस्फुट शब्दों में

बुदबुदाती है -----का करें ---

-------का इन निगोडों के घर

बेटियां नहीं होती -----

--------आँखे फूटे इनकी

--------Divya Shukla--------

पेंटिग  गूगल  से  

Sunday, 7 July 2013

तुम यहीं हो उलझे सुलझे से मुझ में ही कहीं हो



तुम यहीं हो उलझे सुलझे से मुझ में ही कहीं हो

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मन के छुपे कोने से न जाने कब

आज फिर निकल आया बहुत याद आया

वो बिखरे बालों वाला कुछ उलझे ख्यालों वाला

खुद में गुम सा रहता कभी दूर छितिज को तकता

वो न जाने कब तक बैठा रहता --मानो सूरज के साथ

मिल वो सपने बुनता बेतरतीब सी उसकी कमीज

आधी बाहर निकली रहती अक्सर ही तो

मै खिलखिला कर हंस देती वो चिढ जाता

घंटो न मानता घूर के देखता रहता

बस अपनी बोझिल पलकें उठा के

और मै -- मै तो बस्स्स्स उन उलझे बालों में

अपनी उँगलियाँ फंसा के उन्हें सुलझाते हुए

कब उसे भी मना भी लेती पता ही न चलता

अपने पाँव की ठोकरों से पत्थरों को मारते हुए

न जाने कब वो कहाँ खो गया पता ही न चला

पर आज भी वो यही है यहीं कहीं है

उलझे ख्यालों वाला बिखरे बालों वाला लड़का

मेरे आसपास मेरे अवचेतन मन के किसी कोने में

कभी कभी सोचती हूँ तुम बदल तो नहीं गये होगे

तुम्हे तो पता है मुझे बस ऐसे ही पसंद हो तुम

बस बिखरते रहो और मै समेटती रहूँ तुम्हे

तुम्हारा एकटक देखना उफ़ क्यों नहीं समझते तुम

मुश्किल होती है न नहीं कर पाती फिर कुछ मै

दहक उठते है अंगार से चेहरे पर आज भी याद करके

तभी तो कह रही हूँ तुम यही हो यहीं कहीं हो

जा ही नहीं सकते कहीं --कहाँ रह पाओगे मेरे बिना

कौन करेगा तुम्हारे वो सारे काम मेरे बिना जो तुम

जानबूझ के फैला जाते हो --उफ़ हद है ये भी कोई प्रेम हुआ

बड़े मान से बोलते हो मै तुम्हारे बिना रह ही नहीं सकती

हाँ हाँ क्यूँ नहीं जन्मजन्मांतर का करार जो है ---

चलो हटो जाओ भी ---तुम तो बस यूँ ही हो

मुझे पता है ----यही कहीं हो कभी कहीं गये ही नहीं

बस मुझे खीजते देख मुस्करा रहे होगे हमेशा की तरह

----------------Divya Shukla-----------------

8--july -2013

पेंटिग गूगल से

Monday, 1 July 2013

अब तुम तो जानते ही हो न ----

तुम तो जानते ही हो न ---

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मौलश्री की सुगंध आज भी

हर पूर्णिमा को महकती है

अनजाने मे कदम फिर से

नदी तट पे पहुँच जाते

जल मे चांद के प्रतिबिम्ब मे

फिर तुम को खोजते हैं

अब तुम वहाँ नही आते ---

पर वो पूर्णिमा याद आती मुझे

वो पूरे चांद की रात

महक रही थी मौलश्री से

चांद का प्रतिबिम्ब --

इठला रहा था नदी के जल में

तब तुम थे हम थे

निस्तब्ध रात थी

तुम मौन मुस्करा रहे थे

सुन रहे थे धैर्य से मेरी

न खतम होने वाली बातें

मुझे आदत है जोर से हँसने की

और तुम्हें सिर्फ मुस्कराने की

हमारे साथ चांद मुस्कराता

और चांदनी खिलखिलाती थी

पर आजकल सब उदास ---

तुम जो नहीं हो यहाँ -------

अजनबी से बन गये न जाने क्यूं

सुनो ! ज़रा बाहर झांको न

देखो तो - चांद से संदेश भेजा है --मैने

तुम जल्दी आना ---

नदी -चांद -चांदनी सब उदास है

मौलश्री अब ज्यादा नहीं महकती

तुम्हारे बिना ----और मै

क्या कहूँ ?---तुम तो जानते ही हो न

---------Divya Shukla-----------

1-7-2013

पेंटिंग गूगल से